उत्तर प्रदेश में पांचवी बार बसपा की सरकार बनाने के लिए बसपा से बाहर गए नेताओं केा भी वापस लाने की तैयारी

एक जमाने में बाबू सिंह कुषवाहा, नसीमुद्दीन सिद्दीकि, स्वामी प्रसाद मौर्य, बृजलाल खाबरी, दद्दू प्रसाद, तिलक चन्द्र अहिरवार जैसे बसपा के प्रमुख नेता हुआ करते थे

बसपा सुप्रीमो केा पता है कि 2007 जैसी सफलता के लिए जरूरी है कि बसपा के पुराने नेताओं को वापस लाया जाए

ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम और अति पिछड़ों केा आधार बनाकर 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ेगी बसपा

इस रणनीति का असर बिहार और बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी पड़ेगा

अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

लखनऊ। भाजपा में ब्राह्मणों की उपेक्षा को भांपकर मायाबती उप्र के साथ साथ बिहार बंगाल की विधानसभाओं के चुनाव को मद्देनजर रखते हुए ब्राह्मणों के भावनात्मक मुद्दे को उठाने की रणनीति बना रही थीं। इसी बीच माफिया डान विकास दुबे और उसके आधा दर्जन समर्थक ब्राह्मण शूटरों के एनकांउटर में मार गिराए जाने के अलावा डेढ़ दर्जन करीबी रिष्तेदारों जिनमें कई महिलाएं भी हैं को जेल भेजने के मामले को लेकर मायाबती ने बड़े सधे हुए ढंग से ब्राह्मणों के जख्मों में मरहम लगाते हुए यह बयान दिया था कि किसी बिरादरी के एक व्यक्ति के खराब हो जानेसे पूरी बिरादरी खराब नहीं हो जाती। उनके इस बयान ने देषभर के ब्राह्मणों को उनकी ओर आकर्षित किया था।
इसी के बाद मायाबती ने अपनी पार्टी के रणनीतिकारों खासतौर पर राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा में पार्टी के नेता सतीष मिश्रा और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ यह गोपनीय रणनीति बनाई कि यदि माफिया डान विकास दुबे की धर्म पत्नी तथा जिला पंचायत सदस्य श्रीमती ऋचा दुबे को बसपा से टिकिट दे दिया जाय और इसकी घोषणा भी जल्दी कर दी जाए तो इसका राजनैतिक असर उप्र में होने वाले 2022 के चुनाव के साथ साथ बिहार और बंगाल चुनाव पर भी पड़ेगा। उप्र जहां 11 प्रतिषत ब्राह्मण, बिहार 6.9 प्रतिषत तथा बंगाल में लगभग 5 प्रतिषत मतदाता हैं। यदि ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम और अति पिछड़े का जातीय समीकरण चल गया तो उप्र के साथ साथ बिहार और बंगाल के चुनाव में बसपा की दमदार उपस्थिति दर्ज हो जाएगी।
उधर बसपा के शीर्ष नेतृत्व की राय है कि बसपा का आगामी विधानसभा चुनाव 2007 के फार्मूले और जातीय आंकड़े पर लड़ने की दमदार रणनीति बनाई जाए। मालूम हेा कि बसपा के राजनैतिक इतिहास में सबसे बड़ी सफलता 2007 के बिधानसभा चुनाव में मिली थी। इस चुनाव मे बसपा सुप्रीमो ने ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम पिछड़े और अति पिछड़े के जातीय गणित पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में बसपा को उप्र में विधानसभा की कुल 403 सीटों में से 206 सीटें अकेले दम पर जीतने में सफलता मिली थी और उप्र के इतिहास में पहली बार बसपा सुप्रीमो अपनी पार्टी के अकेले बहुमत के दम पर मुख्यमंत्री बनी थीं। वैसे बसपा सुप्रीमो प्रदेष में चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं हैं। वे पांचवीं बार पार्टी में अपनी पूर्ण बहुमत की सरकार में मुख्यमंत्री बनना चाहतीं हैं।
पार्टी के नेतृत्व यह मंथन तेजी से चल रहा है कि 2007 की सरकार में बाबूसिंह कुषवाहा, नसीमुद्दीन सिद्दीकि, स्वामी प्रसाद मौर्य, बृजलाल खाबरी, दद्दू प्रसाद, तिलक चन्द्र अहिरवार जैसे दिग्गज नेता हुआ करते थे। पार्टी में यह भी मंथन चल रहा है कि जो लोग बसपा से निकाले गए और अब तक किसी अन्य दल में शामिल नहीं हुए। उन्हें तो तत्काल पार्टी में वापस ले लिया जाए। लेकिन जो लोग अन्य दलों में चले गए हैं। पार्टी के नेता उनकी नेता राय जानने के लिए उनसे बातचीत करें। यदि वे तैयार हों तो बसपा में उनकी वापसी का रास्ता तैयार किया जाए। यदि बसपा में उससे बाहर गए नेताओं की वापसी हो गई तो बसपा उप्र बिहार और बंगाल के चुनाव में बड़ी मजबूती के साथ लड़ेगी।
बसपा ने आगामी तीनेां चुनावों के लिए ब्राह्मण दलित मुस्लिम अति पिछड़े के जातीय समीकरण को जहां प्रमुखता दी है। वहीं वह उप्र में भाजपा की कमजोर कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाकर चुनाव में उतरेगी और बिहार बंगाल सहित उप्र में यह बात डंके की चोट पर कहेगी कि उप्र में जहां बसपा सुप्रीमो चार बार मुख्यमंत्री रही उनके शासन में भाजपा सपा कांग्रेस के शासनों के मुकाबले अच्छी कानून व्यवस्था रही है। बसपा नेताओं को विष्वास है कि उप्र मे जहां मायाबती पांचवी बार मुख्यमंत्री बनेगी। वहीं बिहार और बंगाल के चुनाव में बसपा अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराएगी।

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