उप्र में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद बुंदेलखण्ड सहित प्रदेश के भाजपा के कई ब्राह्मण नेता बसपा व सपा का दामन थाम लेंगे

बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने बयानों से ब्राह्मण समाज को लुभाया

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेष यादव ने देश में सबसे ऊची भगवान परशुराम की मूर्ति लगवाने का बयान देकर ब्राह्मणों मेें अच्छा असर डाला

प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या 9 प्रतिशत है जो किसी भी पार्टी की जीत को हार में बदल सकती हैं

अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

लखनऊ। जबसे बसपा सुप्रीमो मायावती ने माफिया डान विकास दुबे तथा उसके एक दर्जन गुर्गों का एनकाउण्टर तथा दो दर्जन से अधिक रिष्तेदार व गुर्गे, जिनमें महिलाएं भी हैं के गिरफ्तार किए जाने के मामले में सबसे पहले ये बयान देकर किसी भी बिरादरी में एक व्यक्ति के खराब होने से पूरी बिरादरी को खराब नहीं ठहरा सकते। न केवल उप्र बल्कि पूरे देश के ब्राह्मण समाज को अपनी ओर आकर्षित करने का काम किया है। जब राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर सभी राजनैतिक दलों के ब्राह्मणों का कद घटाया जा रहा हो, उन्हें सभी राजनैतिक दलों में सत्ता और संगठन में कम भागीदारी दी जा रही हो। जब भाजपा की उप्र सरकार में तमाम ब्राह्मण जनप्रतिनिधि अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे हों। ऐसे समय में बसपा सुप्रीमो के बयान ने आग में घी का काम किया है।
ब्राह्मणों में जो दबी हुई नाराजगी थी, वह अब खुलकर सामने आने लगी है। सुश्री मायावती को पता है वैसे तो वे उप्र की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनावी जीत 2007 के विधानसभा चुनाव मिली थी। जब उन्होंने लगभग 96 ब्राह्मणों को विधानसभा के टिकिट दिए थे और 66 प्रत्याषी चुनाव जीते थे। इसी वर्ष 2007 के चुनाव में बसपा को पहली बार इतनी बड़ी जीत मिली थी। बसपा ने 403 में से 206 सीटें अकेले दम जीती थीं और अपने बलबूते उप्र में सरकार बनाई थी। बसपा के अन्दर खाने में यह चर्चा जोरों पर है कि ब्राह्मणों के प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा वोट अपनी ओर करने के लिए बसपा कानपुर देहात जिले की रिनियां विधानसभा सीट से माफिया डान विकास दुबे (अब मृत) की विधवा पत्नी ऋचा दुबे जो जिला पंचायत सदस्य हैं को टिकिट देकर प्रदेश व देश में ब्राह्मणों की सहानुभूति जीतना चाहती हैं। चर्चा यह है कि बुंदेेेेलखण्ड सहित प्रदेश के भाजपा एवं कांग्रेस के कुछ बड़े ब्राह्मण नेता 2022 के चुनाव की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही चुनाव आयुक्त विधानसभा चुनाव की घोषणा करेंगे। बुंदेलखण्ड और प्रदेश के कई बड़े ब्राह्मण नेता बसपा का दामन थाम लेंगे।
उधर समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यह घोषणा करके कि यदि सपा की सरकार उप्र में बनती है तो वे ब्राह्मणों की श्रद्धा के प्रतीक भगवान परशुराम की 108 फुट की मूर्ति लखनऊ में लगवाएंगे। इस तरह की मूर्ति पूरी दुनियां में किसी देश में नहीं है। यह घोषणा करके अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों के दर्द पर मरहम लगाने की कोशिश की है। उनके इस बयान से बसपा सुप्रीमो मायावती को झटका लगा। उन्होंने सोचा कि सपा ब्राह्मणों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने की मनोवैज्ञानिक कोषिष कर रही है। जिस पर वे भड़क गईं और उन्होंने सपा पर पलटवार करते हुए कहा कि ब्राह्मण यदि उन्हें सत्ता में लाते हैं तो वे सपा से ऊची भगवान परशुराम की मूर्ति लगवाने का काम करेंगी।
इस पर सपा के नेता मनोज कुमार पाण्डेय, अभिषेक मिश्रा आदि ने मायावती पर कटाक्ष किया कि वे जब जब सत्ता में आती हैं तो किसकी मूर्ति लगवाती हैं, यह सबको पता है। बहरहाल बसपा और सपा दोनों ही दल सत्तारूढ़ भाजपा और कांगे्रस के ब्राह्मण वोट बैंक पर सेंध लगाने में जुटे हुए हैं। इसका परिणाम चुनाव आयोग जब 2022 में उप्र के विधानसभा के चुनाव की घोषणा करेगा, तब देखने को मिलेगा। तब उप्र के ब्राह्मण नेता जो भाजपा और कांग्रेस में अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। वे भाजपा और कांगे्रस से इस्तीफा देकर बसपा का दामन थाम लेंगे।

संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.

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