करोड़ों मजदूर लॉक डाउन में सैकड़ों मील पैदल चलते रहे, लेकिन मजदूर संगठनों ने क्यों नही उठाई आवाज़- राम कृष्ण शुक्ला

अनिल शर्मा+संजय श्रीवास्तव+डॉ. राकेश द्विवेदी
उरई: लॉक डाउन के दौरान करोड़ों मजदूर और उनके परिजन महानगरों से भूखे प्यासे हालात के मारे तपती दोपहर में सैकड़ो मील पैदल चलकर अपने गांव घरो को पहुंचे हैं। इतनी बड़ी त्रासदी पर देश भर के मजदूर संगठनों ने आखिर कोई आवाज़ क्यों नहीं उठाई, आंदोलन क्यों नहीं किया? यह सवाल बहुत लोगों की मथ रहा है। इस संदर्भ में प्रस्तुत है सामाजिक चिंतक कामरेड राम कृष्ण शुक्ला का लेख।
सोवियत क्रांति के बाद तमाम देशों की तरह भारत ने भी अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ आज़ादी, जनतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष तेज हुए। इसी बीच मजदूर संगठन भी देश ने संगठित होने शुरू हुए। जिसमे ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन(एटक) का संगठन समूचे देश मे मजदूरों के बीच में प्रभावी ढंग से शक्रिय हुआ। ए.आई.टी.यू.सी. (सीपीआई CPI) संगठन मजदूर हितों पर उनके संघर्षों का प्रभावपूर्ण दखल वर्ष 1925 से शुरू हुआ। बाद मे ए.आई.टी.यू.सी. के बढ़ते प्रभाव को देखकर राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस(इंटक) एक मजदूरों का संगठन बना। इसी तरह समाजवादी मजदूर सभा सीपीएम(CPM) ने सेंट्रल ट्रेड यूनियन(सी.टू), भारतीय मजदूर संघ(बी.एम.एस) के अलावा और भी छोटे मोटे मजदूरों के संगठन बनें। कुछ प्रांतीय स्तर के, कुछ राष्ट्रीय स्तर के और कुछ कारखाना स्तर के बने। बने जिन्होंने किसी बड़े मजदूर यूनियन से अपने को कभी एफिलिएट(AFFILIATE) कर लिया तो कभी अकेले होकर या नितांत अकेले मजदूरों के संघर्षों को आगे बढ़ाया। इनमे से अधिकांश संगठन साम्राज्यवाद विरोधी और मजदूर हितों के कानूनों के लिए संघर्ष करते रहे। देश मे मजदूर आंदोलन का एक अच्छा खासा प्रभाव रहा। बात 1948 की है जब गोदी मजदूरों ने मुंबई साम्राज्यवादी विरोधी संघर्ष के तहत ब्रिटिश नेवी के जहाजों से आ रहे हथियारों को उतारने से इनकार दिया। इसी तरह आजादी के बाद मजदूर आंदोलन का एक प्रभावपूर्ण असर रहा। देश के हर राज्यों में, हर छोटे बड़े औद्योगिक केंद्र, हर कारखाने में और कारखाने की हर यूनिट में मजदूरों के संगठनों का प्रभाव रहा। मजदूर संगठनों ने इस देश मे अपने संगठनों और अपने आंदोलनों के प्रभाव से कई सामाजिक और राष्ट्रीय कानूनों ने भी दखल दिया। मजदूर हितों के अनेका अनेक कानून बने। और प्रभावपूर्ण ढंग से मेहनत कशो को आगे बढ़ाने की भूमिका अदा करते रहे। इनमे से ऑल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन की वर्ष 1974 की वह हड़ताल जिसने रेल का पूरा चक्का जाम कर दिया था। इसमे 15 लाख रेलवे मजदूर कर्मचारियों ने हिस्सा लिया था। इसे आज भी ऐतिहासिक हड़ताल माना जाता है। इस हड़ताल ने 110 ट्रेड यूनियन शामिल थीं। कानपुर में भी मजदूर संगठनों ने 6 महीने तक औद्योगिक हड़ताल चलाई थी। वो भी ऐतिहासिक रही थी। इन सभी मजदूर संगठनों का खास असर था। मजदूर आंदोलन के बीच से पूरे में जुझारू और प्रगतिशील लीडर हुए। इनमे कानपुर के CPI नेता एस.एम बेनर्जी जो कानपुर से 7 बार सांसद रहे। जॉर्ज फ़र्नान्डिस, राम आश्रे, दंतों पन्त ठेंगड़ी, संत सिंह यूसुफ, अमृत पाद डांगे, मुजफ्फर अहमद, पचु गोपाल भादुड़ी, इंद्रजीत गुप्ता, मृणाल गोरे, वृन्दा कारन्त इन नेताओं का भी मजदूरों में अलग साख थी। कालांतर में मजदूर आंदालनों का जहां एक ओर बिखराव हुआ। वहीं दूसरी ओर पूंजीवादी सत्ता केंद्रों ने मजदूर संगठनों में तोड़फोड़ पैदा की। इसी तरह केंद्र और राज्य सरकारों ने कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में और मजदूरों के विरुद्ध कानूनों का एक के एक बाद प्रहार होना शुरू हुआ। पूंजीवादी तकनीकी विकास के क्रम में भी आंदालनों और औद्योगिक मजदूर संगठनों के कैडरों में भी विघटन और बिखराव पैदा हुए। तमाम औद्योगिक केंद्र बंदी के शिकार हुए। मजदूर वर्ग में निराशा और बिखराव योजनाबद्ध तरीके से किये गए। जिसका बड़े पैराय पर मजदूर संगठनों में बिखराव और प्रभावहीनता बढ़ी। आज तमाम कानपुर जैसे औद्योगिक केंद्रों के कारखाने बन्द हो गए। मजदूर बेरोजगारी के शिकार हुए। उनके संघर्ष भी बुरी तरह पस्त हुए। तमाम ट्रेड यूनियन केंद्रों में ताले पड़ गए और वे निष्प्रभावी हो गए। इसी तरह संसद और विधानसभाओं में मजदूर हितों के कानूनों को बदला गया। और अदालतों में भी मजदूर हितों का संरक्षण कमजोर पड़ा। इसका ही परिणाम है कि कोरोना महामारी के कारण केंद्र सरकार ने देश व्यापी लॉक डाउन लगाया। उससे महानगरों, शहरों, औद्योगिक केन्द्रों में जो ताला बंदी हुई, बिल्डरों तथा अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में जो कारोबार बंद हुआ तो मेहनत मजदूरी करने वालो की आजीविका बंद हो गयी। वहां दुकानदारों ने उन्हें उधार देने बंद कर दिया। मकानमालिकों ने कोरोना के डर से मजदूरों को कमरा शीघ्र खाली करने का दबाव देना शुरू किया। मजदूरों को धीरे धीरे जब जमापूंजी खत्म होने लगी तो उन्होंने वापिस अपने गांव घर लौटने का फैसला कर लिया। मजदूर अपने साथी मजदूरों तथा जिन मजदूरों को परिवार वहां रह रहे थे। वे अपने परिवार के लोगों के साथ गांव घर पैदल ही निकल पड़े। इतनी बड़ी घटना जिसमे हालात के मारे मजदूर भूखे प्यासे पैदल हाइवे पर तपती धूप में पैदल चलते रहे। लेकिन देश के किसी भी मजदूर संगठनों ने उनको इस त्रासदी से बचाने के लिए देश व्यापी आंदोलन की घोषणा नहीं की। न ही उन्होंने इनके खाने पीने या आश्रय देने या आर्थिक रूप से कोई मदद नहीं की। इससे यह बात खुलकर सामने आ गई कि अक्सर अपनी मांगों को लेकर 3-4 दशक पहले देश व्यापी हड़तालों या आंदालनों का बिगुल बजाने वाले ये मजदूर संगठन आज कितने कमजोर हो गए हैं कि असंगठित मजदूरों की इतनी बड़ी त्रासदी में वे मौन बने रहे। ये वही मजदूर संगठन हैं जो अपने पिछले ऐतिहासिक चल चलाव के दिनों में मजदूर आंदोलनों उनके राष्ट्र व्यापी दिल्ली चलो अभियानों के सुनहरे वर्क आज भी मजदूर संगठनों के इतिहास की किताबों में दर्ज है।
संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.
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