कांग्रेस में पीढ़ी की लड़ाई

राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ ही राहुल गांधी युवाओं कोे प्रमुख पद देकर आगे लाना चाहते थे
लेकिन बुजुर्ग नेताओं ने उनकी मंशा पूरी नहीं होने दी
2019 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष से इस्तीफा दे दिया और संगठन में उनकी आवाज कमजोर पड़ने लगी
अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

दिल्ली। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले जब राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। तो राहुल गांधी ने पार्टी के भीतर युवा पीढ़ी को खड़ा करने की पुरजोर कोशिश की। अधिकांश राज्यों में उन्होंने युवाओं को पार्टी का नेतृत्व दिया। उन्होंने राजस्थान में सचिन पायलट को, हरियाणा में अशोक तंवर को, महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा को, मध्य प्रदेश में अरुण यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया को, इसी तरह पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू , उप्र में प्रियंका गांधी और अजय कुमार लल्लू को आगे बढ़ाने का काम किया। इसी तरह कर्नाटक से लेकर तमाम प्रदेशों में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया।
राहुल गांधी की कोशिश रही कि कांग्रेस में युवा नेतृत्व की ऐसी सेकेण्ड लाइन बनाई जाए, जो पुरानी पीढ़ी का स्थान ले सकें। वे नए जोश के साथ पार्टी को पूरे देश में खड़ा करना चाहते थे। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने देशभर का व्यापक दौरा किया और इस दौरान युवा नेतृत्व को खड़ा करने की कोशिश भी की। पार्टी के भीतर वर्षों से जमे जमाए बुजुर्ग और वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने राहुल के इस प्रयास को असफल बनाने में कई महीन चालें चलीं। इसका परिणाम यह हुआ कि मप्र और राजस्थान में क्रमशः ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट को कमलनाथ और अशोक गहलोत जैसे बुजुर्ग नेताओं के हाथ में सत्ता की बागडोर दे दी गई। जिसके बाद कांग्रेस के भीतर युवा बनाव बुजुर्ग का संघर्ष शुरू हो गया।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को मिली करारी हार के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते राहुल गांधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया और श्रीमती सोनियां गांधी को पुनः राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। यहीं से कांग्रेस के भीतर बुजुर्ग और युवाओं के बीच खाई चैड़ी होती गई। धीरे धीरे कांग्रेस में युवा नेतृत्व को कमजोर किया गया। इसमें सबसे अधिक भूमिका अहमद पटेल जो कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष हैं, पूर्व राष्ट्रीय महासचिव और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, मल्लिकार्जुन खारगे, दिग्विजय सिंह, कमल नाथ, मोती लाल बोहरा और पी0 चिदंबरम आदि सोनिया गांधी के सलाहकार बने हुए हैं। जिनके कारण युवा नेतृत्व आगे बढ़ने में सफल नहीं हो पा रहा है।
पहले मप्र इसके बाद राजस्थान में युवा बनाम बुजुर्गों की लड़ाई सड़कों पर आ गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चाहे कपिल सिब्बल हों, जितेन्द्र प्रसाद हों, प्रिया दत्त हों या संजय निरुपम हों। इन्होंने सचिन पायलट के मामले में पार्टी नेतृत्व को समझाने की कोशिश की और इससे पार्टी को होने वाले नुकसान से आगाह किया। प्रियंका गांधी ने भी इस लड़ाई में समझौता कराने की कोशिश की। लेकिन बुजुर्ग नेता अशोक गहलोत इसके लिए तैयार नहीं हुए। इन स्थितियों से राहुल गांधी भी असहज हैं। वे आगे आने वाले दिनों में राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद तभी संभालने के लिए तैयार होंगे, जब पार्टी सर्वसम्मति से उन्हें यह पूरा अधिकार दे दे और यह पूरी स्वतंत्रता मिल जाए कि पार्टी में वे युवा नेतृत्व को उभार सकें। वरना इसकी एक खराब परिणिति यह भी हो सकती है कि कांग्रेस के युवा नेता नई पार्टी बनाने को मजबूर हो जाएं।

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