काशी-मथुरा बाकी है-सुधीर सिंह

विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्रा के मुताबिक, समुदाय विशेष को ज्ञानवापी कब्जे वाले धर्मस्थल को स्वस्थ मानसिकता से छोड़ देना चाहिए

मुफ्ती-ए-बनारस इमाम अब्दुल बातिन नोमानी कहते हैं, काशी-मथुरा बाकी है जैसे नारों की यहां कोई अहमियत नहीं, बनारस और अयोध्या में बहुत फर्क है

कर रहे हैं। सुधीर सिंह वही व्यक्ति हैं जो काशी में सबसे मजबूती से यह दावा कर रहे हैं कि अयोध्या के बाद अब ‘काशी-मथुरा बाकी है’ के नारे को हकीकत में बदलने का समय आ गया है। वे कहते हैं, ‘अगर लॉकडाउन न हुआ होता तो अब तक या तो काशी विश्वनाथ मुक्त हो गया होता या फिर हम राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत जेल में बंद होते।’

उनके इस बयान का पहला हिस्सा भले ही काल्पनिक हो, लेकिन दूसरा हिस्सा काफी हद तक सही है। बीते कुछ समय में सुधीर सिंह की कई गतिविधियां ऐसी रही हैं जिनके चलते उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुकदमा दर्ज हो सकता था। राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के कुछ ही समय बाद सुधीर सिंह ने बनारस में ‘काशी विश्वनाथ मुक्ति आंदोलन’ की शुरुआत कर दी।

फरवरी में महाशिवरात्रि के दिन काशी के मशहूर अस्सी घाट पर इसकी औपचारिक घोषणा की गई। सुधीर सिंह दावा करते हैं कि लगभग दस हजार लोग इस मौके पर उनके साथ मौजूद थे जिन्होंने ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के साथ उस दिन संकल्प लिया कि काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद को अब हटाकर ही मानेंगे।

बीते आठ महीनों में सुधीर सिंह दो बार जेल भी जा चुके हैं। उनकी पहली गिरफ्तारी तब हुई थी जब उन्होंने काशी के संकटमोचन मंदिर से ज्ञानवापी तक ‘दण्डवत यात्रा’ निकालने का ऐलान किया। यह यात्रा कई मुस्लिम बहुल इलाकों से होकर निकलनी थी लिहाजा माहौल बिगड़ने की आशंका को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने यात्रा से एक दिन पहले ही सुधीर सिंह को गिरफ्तार कर बनारस जिला जेल भेज दिया।

तीन दिन जेल में रहने और दस लाख के जमानती पेश करने के बाद सुधीर सिंह को जमानत मिल गई। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर एक और विवादास्पद आयोजन किया। इस बार वे ‘काशी कोतवाल’ कहलाने वाले बाबा भैरव नाथ के मंदिर पहुंचे और यहां उन्होंने काशी विश्वनाथ की ‘मुक्ति’ के लिए एक ‘मुक्ति पत्रक’ मंदिर में दिया। इस बार मंदिर से ही सुधीर सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया जहां वे चार दिन रहे और दोबारा दस लाख के जमानती पेश करने के बाद रिहा हुए। ये घटना देश भर में लागू हुए लॉकडाउन से ठीक पहले की है।

लॉकडाउन शुरू हुआ तो सुधीर सिंह की गतिविधियों पर भी रोक लग गई। लेकिन इस दौरान वे सोशल मीडिया के माध्यम के इस मुद्दे को लगातार बेहद आक्रामक तरीके से उठाते रहे हैं। वे बताते हैं कि ‘काशी-मथुरा बाकी है’ के नारे पर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) भले ही खुले तौर से अभी कुछ नहीं कह रहे लेकिन सोशल मीडिया पर भाजपा के आईटी सेल से उन्हें पूरा समर्थन मिल रहा है।

सुधीर सिंह ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं जो काशी विश्वनाथ की कथित मुक्ति के लिए बनारस में इन दिनों मुखर हैं। अखिल भारतीय संत समिति, अखाड़ा परिषद और खुद काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े कुछ पुजारी भी अब इस मुद्दे पर बोलने लगे हैं। विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्रा ने तो हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करते हुए लिखा है, ‘समुदाय विशेष को वाराणसी के ज्ञानवापी स्थित कब्जे वाले उस धर्मस्थल को हृदय पक्ष के स्वच्छ भाव व स्वस्थ मानसिकता से छोड़ देना चाहिए जो एक आक्रांता के द्वारा बर्बरता से बाबा विश्वनाथ के मन्दिर को तोड़कर बनाया गया।’

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