कोरोना की निष्ठुरता : हारमोनियम से सुर छीने, उदास कर दिया तबला

गीत गान करने वाले कलाकार लगा रहे फेरी और पका रहे मोमो 
समय ऐसा आया के ‘बुन्देल खंड के रफी’ मिर्जा साबिर भी हुए बेरोजगार
अनिल शर्मा+ संजय श्रीवास्तव+ डॉ. राकेश द्विवेदी
उरई । अब तो संगीत की महफिलें सूनी पड़ी हैं । न तो वहाँ हारमोनियम का कोई सुर सुनाई पड़ता है, न ही मटक- मटक कर अपनी थापों से कानों में लय बद्ध कंपन पैदा करने वाले तबले की कोई हरकत दिख रही है। कलाकार भी उदास है। जिन कंठों से सुर भरे नगमे निकलते थे ,उनसे अब ‘कपड़े ले लो – कपड़े’ के बोल फूट रहे हैं। कोरोना ने ऐसा कहर बरपाया कि एक कलाकार तो मोमोज तक बेचने को मजबूर हो गया।

ये भूख भला क्या – क्या न कराए ? चार महीने में ही संगीत की विधा और इसके सहारे पेट पालने वाले भूख से कराह पड़े ! कहीं कोरोना का समय बढ़ा तो फिर कई कलाकार तो संगीत की विधा को ही बदलने पर मजबूर हो जायेंगे ! कुछ तो नई राहों पर चलने को विवश भी हो गए । जब घर पर रोटियों का संकट गहराया तो एक गायक कपड़ों की फेरी लगाने को गली – मोहल्लों की ओर चल पड़ा। अभी तक तजुर्बा गाने का था अब चिल्लाना पड़ रहा है। वह ऐसा कर भी रहा है , क्योंकि इस चिल्लाहट में ही उसके परिवार की रोटियां छिपी हुई हैं। एक कलाकार ऐसा भी है जो अपने वाद्य कला से हर किसी को आकर्षित कर रहा था , वह अब शहर के एक कोने में मोमोज की ठिलिया लगा रहा है। कहते हैं कि मजबूरी अनुभव भी सिखा देती है। ऐसा ही कुछ वह भी कर रहा है! उदास तो ‘बुन्देलखंड के रफी’ नाम से विख्यात जोशीले गायक मिर्जा साबिर बेग भी हैं। 2015-16 में प्रदेश सरकार की ओर से उन्हें बेगम अख्तर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और तीन वर्षों से वह इसी समिति के सदस्य भी हैं। आज इस गायक की भी मजबूरी देखिए कि उसे भी अब कोई ऐसा काम खोजना पड़ रहा है ताकि गृहस्थी चल सके।
जब उनसे रूबरू हुआ गया तो सदैव हंसती रहने वाली आँखें रोने को आतुर थीं। आज संगीत के लंबे आलाप की जगह सिर्फ व्यथा और चिंता की लंबी आहें थीं। बोले- चार महीनों में ही हमारी संगीत की दुनिया भी तबाह हो गई ! जब भीड़ नहीं होगी तो भला किसके लिए गायन और कैसा वादन ? पहले खुशियों के विविध समारोह , धार्मिक कार्यक्रमों में हुनर दिखाने का अवसर मिलता था । यह हमारी तपस्या भी थी और रोजगार भी। समय के थपेड़ों में अब तो खाली हाथ ही रह गए।
ढोलक, तबला, हारमोनियम, आर्गन ,पैड और बाँसुरी बजाने वाले नई सुबह का इंतजार कर रहे हैं। संगीत से जुड़े उरई में करीब 55 कलाकार हैं। जिले भर में यह संख्या ढाई सौ के आसपास बताई गई। गायन में कई लड़कियां भी इसमें अपना भविष्य खोज रही थीं। मिर्जा साबिर बताते हैं कि शादी -समारोहों के इतर सरकारी आयोजनों, भागवत कथाओं , भजन संध्या जैसे कार्यक्रमों में तबला- ढोलक बजाने का काम मिल जाता था। इन्हीं से गायकों को भी सहारा था जो अब बन्द हैं। अब ये कब तक चलेगा ? ऊपर वाला ही जाने। फिर वह कुछ उम्मीदों को बटोरते हुए कहने लगे कि सरकार ही हम – लोगों के लिए कुछ करे। कुछ मदद हो जाये तो संगीत के सुर भी जीवित रह जाएंगे, अन्यथा तमाम कलाकार विधा को छोड़कर चला जायेगा ! अपने पिता के बाजू में बैठी गायिका शालिनी मिर्जा भी चुप न रह सकीं। बोलीं – अब तो रियाज करने का भी दिल नहीं करता ! भविष्य की भी चिंता अलग से खाये जा रही है।
वाकई, संगीत की दुनिया में ऐसा मंजर पहले कभी नहीं दिखा। अब तो यहाँ उदासी है। आवाज मानो सहम सी गई हो। हारमोनियम तक अपने सभी बारह सुरों को भूल एक कोने में खामोश बैठी है। तबला और ढोलक तो पहले से ही सहमे हुए हैं। इन वाद्य यंत्रों को इस स्याह रात की सुबह होने का इंतजार है ताकि वह फिर से महफिलों को गुलजार कर स्वर लहरियां प्रवाहित कर सकें।