कोरोना महामारी ने छीन ली आजीविका

पिछले तीन महीनों से अपना सामान बनाकर ग्राहक इंतज़ार में बैठे रहते हैं लौहपीटा
झाड़ू बनाने वालों को अब कोई खरीददार नहीं मिल रहा
जब लौहपीटा और झाड़ू बनाने वाले बेचने के लिए शहर की बस्तियों और गलियों में जाते हैं तो उन्हें कोरोना फैलाने वाला कहकर भगाया जाता है
तीन महीनों से कमाई न होने पर इनके घरों में चूल्हे जलने की है समस्या
अनिल शर्मा+संजय श्रीवास्तव+डॉ. राकेश द्विवेदी
झाँसी: ग्वालियर रोड पर पहाड़ी के पीछे जौहर नगर नाम की एक मलिन बस्ती है। इस बस्ती में 150 से अधिक परिवार रहते हैं। इनमे अधिकांश लौहपीटा, बैंड बजाने वाले, कबाड़ बीनने वाले और झाड़ू बनाने का काम करने वाले परिवार रहते हैं। कोरोना महामारी के दौरान बीते तीन महीनों से रोज कमाने और खाने वालों की कोरोना महामारी ने इन लोगों की आजीविका छीन ली है। जौहर नगर की रूपा, शांति, ममता, किरन और रूबी ने बताया कि पिछले तीन महीनों से लॉक डाउन और उसके बाद भी हम लौहपीटों की हस्तनिर्मित लोहे की कढ़ाई, अमकटना, हसिया, चाकू(सब्जी काटने वाले), थैंथा, करछुल झरिया, खुर्पी, कुल्हाड़ी जो आसानी से बिक जाती थी तीन महीनों से ग्राहकों ने आना ही बन्द कर दिया है। लिहाजा हमलोगों के घरों में चूल्हा कैसे जले इसकी समस्या आ गयी है। इसी तरह अठौदना रोड में स्थित झोपड़पट्टी में रहने वाली फूलमती, रामा, निर्मला, सुमन, विमला, शिवकली और रामादेवी ने बताया कि हम लोग घरों में सफाई के लिए झाड़ू बनाने का काम करते हैं। हम लोग प्रतिदिन कोरोना महामारी के पहले शहर की बस्तियों में जाकर एक-एक परिवार 400 से 500 रुपये की झाड़ू बेच लेता था। हमारे घर परिवार का खर्चा आराम से चल जाता था। लेकिन तीन महीने पहले जबसे देश ने कोरोना का कहर आया है हम लोगों की झाड़ू बिकना बिल्कुल बन्द हो गयी है। हम और लौहपीटा बहने यदि पहले की तरह शहर की बस्तियों और गलियों में अपना सामान बेचने जब जाते हैं तो अब लोग हमें देखते ही कोरोना फैलाने वाले आ गए कहकर हमे दुत्कारते हैं, गाली गलौज करते हैं और हमे मारने को दौड़ते हैं। हम लोगों की पिछले तीन महीने से रोजी रोटी बन्द है। सरकारी राशन मिल गया या समाजसेवी संस्था परमार्थ आकर हमे राशन किटें दे जाती है। लेकिन इस सबके बावजूद पिछले तीन महीनों से आजीविका बन्द हो जाने के कारण हमारी ग्रहस्ती चौपट हो गयी है। यही हाल बैंड बजाने वाले रमेश, सुरेश, श्याम मोहन, हरि कृष्ण और शफीक का है। उन्होंने बताया कोरोना के कारण शादियां होती नहीं। और अगर शादी होती भी है तो तमाम कानूनी झंझटों के चलते 25 से 50 लोगों के बीच घराती और बराती के बीच शादी कर लेते हैं। ऐसे में संख्या बढ़ाने के लिए बैंड बाजे वालों को कौन बुलाएगा। पिछले तीन महीने से हम बैंड बजाने वाले हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इसी तरह कबाड़ बीनने का धंधा करने वाले अकबर, मुस्तफा, नईम, शहजादे, रुबिया, नरगिस ने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान हम लोगों का धंधा बिल्कुल चौपट हो गया है। हम लोग दाने दाने को मोहताज हो गए हैं। कभी कभार सरकारी राशन और कभी-कभी परमार्थ समाजसेवी संस्था हमे खाद्यान किट दे देती है। लेकिन इससे हमारे घर की सभी जरूरते पूरी नहीं हो जाती। कोरोना महामारी के तीन महीनों में हमारे घरों मे चुल्हा जलने की समस्या हो गयी है। किसी तरह हमलोग समय काट रहे हैं। रोज कमाने खाने वालों के लिए यह समय सबसे खराब है।
संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.
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