कोरोना महामारी में मनरेगा मजदूरों को 30 दिनों से भुगतान नहीं

मजदूरों के परिवारों में राशन के खाद्यान से जल रहा है चूल्हा
अनिल शर्मा+संजय श्रीवास्तव+डॉ. राकेश द्विवेदी
उरई: कोरोना महामारी एक तरफ रोजगार, धंदे, खेती, किसानी सबकुछ चौपट कर रही है। ग्राम पंचायतों में केवल मनरेगा ही है जो मजदूरों के लिए जीवन यापन का एकमात्र साधन बन गयी है। लेकिन ग्राम मुसमरिया में पिछले 30 दिनों से जॉब कार्ड धारक मजदूरों की दिहाड़ी उनके बैंक खाते में नहीं आयी है। यदि सरकार और प्रशासन की ओर से जॉब कार्ड धारकों व अन्य मजदूरों को मुफ्त में राशन न मिला होता तथा अन्य गरीबों को बेहद कम कीमत पर राशन कार्ड पर चावल और गेहूं न मिला होता। तो जिले के अधिकांश गांव में मजदूरों और गरीबों के यहां चूल्हा न जला होता।
पिछले दो दिनों से द यंग भारत की टीम को लेकर संवाददाता सुधीर कुमार राना ने ग्राम मुसमरिया, अटरिया, अलाईपुरा, जलालपुर आदि ग्रामो मे टीम के साथ जाकर मनरेगा मजदूरों और प्रवासी मजदूरों के काम तथा उनका चूल्हा कैसे जल रहा है, इसकी जानकारी ली। ग्राम मुसमरिया में जब ये टीम पहुंची तो ग्राम मुसमरिया से ग्राम अटरिया तक लगभग ढाई किलोमीटर सम्पर्क मार्ग के निर्माण का कार्य मनरेगा मजदूर कर रहे थे। वहां काम कर रहे मनरेगा मजदूर छोटे लाल और राम बाबू ने बताया कि पिछले 40 दिनों से मनरेगा की मजदूरी का भुगतान नहीं मिला है। उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी को देखते हुए योगी सरकार और जिला प्रशासन ने कोटेदारों को निर्देश दिए हैं कि जो जॉब कार्ड धारक मजदूर हैं। उन्हें कोरोना काल मे फिलहाल तीन माह तक प्रति यूनिट 7 किलो चावल और 3 किलो गेहूँ मुफ्त दिया जा रहा है। यानी जिस मनरेगा मजदूर के घर 5 सदस्य हैं उसे 35 किलो चावल और 15 किलो गेहूँ 3 माह तक बिल्कुल मुफ्त मिलेगा। इसके अलावा जो भी गरीब जिसके पास राशन कार्ड है उन्हें 3 किलो प्रति यूनिट गेहूँ 3 रुपए किलो के हिसाब से तथा 7 किलो प्रति यूनिट चावल 2 रुपए प्रति किलो के हिसाब से दिया जा रहा है। यानी एक गरीब मजदूर परिवार में 5 सदस्य हैं और उसके पास राशन कार्ड है तो उसे 35 किलो चावल मात्र 70 रुपए में तथा 15 किलो गेहूँ मात्र 45 रुपए में मिल रहा है। यानी उस गरीब परिवार का एक महीने का खाना सिर्फ 115 रुपए में हो जाएगा। जबकि इतना ही खाद्यान जॉब कार्ड धारक मजदूर तथा अन्तोदय कार्ड धारक गरीब को यह सब बिल्कुल मुफ्त मिलेगा।
इस संदर्भ में ग्राम मुसमरिया के प्रधान राम जी सिंह ने बताया कि उनकी ग्राम पंचायत की कुल आबादी लगभग 13000 है। इस गांव में मनरेगा जॉब कार्ड धारक मजदूरों की संख्या 530 है। जबकि प्रवासी मजदूरों की संख्या 40 है। उन्होंने सम्पर्क मार्ग में हो रहे कार्य को दिखाते हुए बताया कि मात्र 203 मजदूर ही कार्य कर रहे हैं। इसका कारण पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि तमाम प्रवासी मजदूर अभी बहुत दूर से लौटे हैं। सरकार की ओर से खाने के लिए राशन मिल ही रहा है। इसलिए वो अभी काम मे नही आ रहे हैं। श्री सिंह ने बताया कि वे प्रतिदिन मनरेगा के कार्य के लिए गांव भर मे डुग्गी पिटवाते हैं। जो मजदूर काम मे आते हैं उनकी हाजरी प्रतिदिन होती है। तथा 201 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से दिहाड़ी दी जाती है। वहीं ग्राम पंचायत मित्र जयप्रकाश नारायण ने बताया कि सभी गांव के 530 जॉब कार्ड धारकों और 40 प्रवासी मजदूरों को प्रतिदिन डुग्गी पिटवाकर बलाया जाता है। जो भी मजदूर आ जाते हैं उन सभी को काम दे दिया जाता है। ये पूछे जाने पर की मनरेगा मजदूर कह रहे हैं कि उन्हें 40 दिनों से दिहाड़ी नहीं मिली है। पंचायत मित्र जयप्रकाश नारायण ने बताया कि 40 नहीं बल्कि 30 दिन की दिहाड़ी बकाया है। मस्टर रोल बनाकर विकास भवन में जमा कर दिया गया है। लखनऊ से स्वीकृत होकर जैसे ही पैसा आएगा वह तत्काल इनके खातों में चला जाएगा। उन्होंने स्वीकार किया कि इस देरी के कारण मनरेगा मजदूर व उनके परिवार आर्थिक रूप से परेशान हैं। इसी तरह ग्राम अटरिया की प्रधान कुशमा देवी पत्नी नर सिंह, पंचायत मित्र इंद्र पाल, सचिव साधना राठौर ने द यंग भारत टीम को बताया कि इस ग्राम पंचायत की आबादी 7000 है। जबकि जॉब कार्ड धारकों की संख्या 380 है। जबकि इस भीषण गर्मी और कोरोना बीमारी की दहशत के कारण सिर्फ 60 से 70 मजदूर काम पर आ रहे हैं। इन मजदूरों की मदद से 400 मीटर लंबा सम्पर्क मार्ग का निर्माण किया जा रहा है। इसी तरह ग्राम पंचायत अलाईपुरा की कुल आबादी 6000 है। यहां जॉब कार्ड धारकों की संख्या 182 है। जबकि प्रवासी मजदूरों की संख्या 43 है। इस ग्राम की प्रधान श्रीमती हर्ष कुमारी, सचिव जितेन्द्र पटेल, पंचायत मित्र वंदना देवी ने बताया कि यहां मेड़ बंदी का कार्य करवाया जा रहा है। इस गांव में 15 दिनों में मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी का भुगतान उनके खातों में हो जाता है। इसी तरह जब यह टीम जलालपुर पहुंची तो वहां के मनरेगा मजदूर ग्राम जलालपुर से ग्राम रगौली का सम्पर्क मार्ग बनाने ने मशगूल थे। यहां लगभग 50 मजदूर कार्य करते मिले।
इन सभी प्रधानों, पंचायत सचिवों तथा पंचायत मित्रों ने स्वीकारा कि जिस तरह से मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी खाते में जाने में देरी हो रही है। यदि सरकार और प्रशासन ने मजदूरों और गरीबों के राशन का प्रबंध न किया होता तो सैकड़ों गांव में हजारों मजदूरों के परिवारों में चुल्हा तक नही जला होता।
संजय श्रीवास्तव- प्रधानसम्पादक एवं स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक
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