कोविड काल ने बदला सामाजिक नजरिया

काम जरूरी नाम नही की सोच पर आगे आये युवा

आत्म निर्भर भारत की पहल हुई मजबूत

उरई(जालौन)। ख्याली पुलाव पकाने वालों की फेहरिस्त सूची में अब काफी वदलाव दिखलाई देने लगा है देखा जाये तो जिस तरह से बीते कुछ माह के दौरान सामाजिक नजरिये में परिवर्तन देखने को मिला है वह कम चैकाने वाला नही है कोविड काल के दौरान लगाये गये लाक डाउन की मुसीबतो ने लोगो के सामने जो सच्चाई ला दी वह उन्हें जीवन की हकीकत से जोडने में काफी कारगर साबित हुयी यही नही देश के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकल को वोकल बनाये जाने की पहल का भी यह असर रहा कि अब लोग काम को महत्व देने लगे है।
शिक्षा की मूल मंशा जीवन को हर तरीके से बेहतर बनाना रही है फिर वह कोई भी दौर क्यो न रहा हो पर विकास की इस अंधी दौड में यह महज धनोपार्जन तक ही सिमट कर रह गयी नतीजतन उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले अपनी योग्यता का मूल्यांकन धनोपार्जन के साधनों और सुविधाओं को जुटाने से करने लगे जिसका परिणाम यह रहा कि सामाजिक परिस्थतियों और हालातों की परवाह किये वगैर लोग सपनों को प्रथामिकता देकर उन्हें सकार होते देखने की ख्वाहिश को अपने से अलग न कर सके फिर चाहे उनके जीवन का संतुलन ही क्यों न बिगड जाये बहरहाल कोरोना काल ऐसी सोच रखने वाले लोगो के नजरिये को बदलने में काफी अहम साबित हुआ है अब लोग काम को महत्व देने लगे है उनके लिये परिवार का आर्थिक संतुलन बनाना जरूरी हो गया है देखने को मिल रहा है कि उच्च शिक्षा प्राप्त युवा भी छोटे रोजगारों के प्रति उन्मुख होने लगे है जो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्म निर्भर भारत की अवधारणा को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान साबित होगी।
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