ग्राम विकास विभाग की साजिश के खिलाफ बाँदा के आधा दर्जन गांव में प्रवासी मजदूरों ने फावड़ा और कुदाल उठाकर शुरू कर दिया श्रमदान

ग्राम भांवरपुर की घरार नदी से शुरू हुआ श्रमदान जिसे जबरियां मनरेगा के काम बताए जाने पर आक्रोशित मजदूरों ने एक साथ 6 गांव में श्रमदान शुरू किया
प्रवासी मजदूर बोले हम तोड़-फोड़ पर नहीं सकारात्मक विरोध के हैं पक्षधर
हमने अपने श्रम से घरार नदी को पुनर्जीवित किया अब क्षेत्र की कागजों में बनी नहरों को अपने श्रम से चालू करके रहेंगे
अनिल शर्मा+संजय श्रीवास्तव+डॉ. राकेश द्विवेदी
बाँदा: बाँदा जिले की नरैनी तहसील में स्थित ग्राम भांवरपुर मे दस दिनों की श्रमदान के बाद प्रवासी मजदूरों ने एक दशक बाद जिस घरार नदी को पुनर्जीवित कर दिया था। ग्राम विकास विभाग ने शासन और जनता की आखों में जिस तरह से धूल झोंकते हुए मनरेगा के काम बताकर वहां बोर्ड लगा दिया। इससे महिला, पुरूष श्रमदानी मजदूरों की आखों में आंसू आ गए, आक्रोश में उनका चेहरा तम-तमा गया, विरोध में उनकी मुट्ठियां तन गयीं। लेकिन समाजसेवी राजा भैया के यह समझाने पर की वो मनरेगा का बोर्ड दूसरे के श्रम को अगियाने के लिए लगाते हैं। लेकिन हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सिद्धांतों को मानने वाले हैं। हम तोड़-फोड़ पर विश्वास नहीं करते हैं। हम सकारात्मकता पर विश्वास करने वाले लोग हैं। इसलिए उन्होंने घरार नदी के श्रमदान को जिसे हजारों लोगों ने देखा, कई गांव के लोगों ने श्रमदान किया। जिससे खुश होकर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन 52 प्रवासी मजदूर श्रमदानियों को भागीरथ कहकर पुकारा और लखनऊ बुलाकर सम्मान देने की घोषणा की। इससे बौखलाये ग्राम विकास विभाग बाँदा के अधिकारियों ने ऐसा कुचक्र रचा कि हमे हमारे ही बहाये पसीने को हमसे अलग करने की कोशिश की। इसका जवाब सकारात्मक रूप से देते हुए इस क्षेत्र के विभिन्न ग्रामों के मजदूरों ने कागजों में बनी नहर और नालियों को खोदकर बरसात के पहले ऐसा कर देने की रणनीति बनाई। जिससे इस बरसात मे नहरें भर जाएं और किसानों को खेती के लिए पर्याप्त मात्रा मे पानी मिल जाये। इसी सकारात्मकता के चलते ग्राम भाऊ सिंह के पुरवा से पुनः श्रमदान का कार्य शुरू हुआ। जो आज आधा दर्जन गांवों में पहुंच गया है। इन प्रवासी मजदूरों ने अपने गांव तक नहर को खोदकर खेती के लिए जरूरी पानी ले जाने की ठानी है। आज शनिवार से ग्राम भाऊ सिंह के पुरवा के साथ खम्भौरा, पिपरहरी, कुचबघियन पुरवा, कठैला पुरवा और सुलखान के पुरवा में एक साथ 6 जगहों पर पुरुष कुदाल, फावड़े तथा महिलाएं डलिया, तसला लेकर ग्राम भाऊ सिंह के पुरवा में नहर की खुदाई और उसकी सफाई में 65 प्रवासी मजदूर प्राणपण से जुट गए हैं। आसपास के गांव के बाशिंदे इन श्रमदानियों को राशन सामग्री पहुंचा रहे हैं। खुद रही नहर के किनारे सामुहिक रसोई, लोकगीत गाते हुए महिलाएं बना रही हैं। जबकि कीर्तन मंडलियां श्रमदानियों का उत्साह बढ़ाने में जुटी हुई हैं। सैकड़ों साल पहले से बुंदेलखंड में एक परंपरा है कि जिस भी गांव में नदी, तालाब, नहर के लिए श्रमदान होता है। तो उन्हें समर्थन देने के लिए आसपास गांव के ग्रामीण, किसान, मजदूर आते हैं। श्रमदानियों के साथ श्रमदान करते हैं। अपने साथ लाये खाद्यान से सामूहिक रसोई बनाते हैं। और फिर मिलकर आत्मीयता एवम उल्लास के वातावरण में साथ मे सहभोज भी करते हैं। आज उपरोक्त 6 गांवों के अलावा ग्राम नीबी और नौगांव के मजदूर भी इस श्रमदान में शामिल हुए। प्रवासी श्रमदानी मजदूर पुरुष और महिलाएं काम करते हुए ये नारा लगा रहे थे कि अपनी नहर अब हम बनाकर रहेंगे। ग्राम कुचबघियन पुरवा में 35 प्रवासी श्रमकि श्रमदानियों ने नाली निर्माण में भागीदारी की। इनमे गुलाबवती, लक्ष्मी, अन्नू, पप्पू, राहुल, फूलचंद और महेश आदि हैं। ग्राम कठैला पुरवा में 32 व पिपरहरी में 38 प्रवासी मजदूरों ने आज श्रमदान में हिस्सा लिया। सिचाई विभाग के अधिशासी अभियंता सरदार सिंह चौहान को जैसे ही भाऊ सिंह के पुरवा पर नहर की खुदाई व सफाई श्रमदानियों द्वारा किये जाने की जानकारी मिली। तो उन्होंने एक विभागीय कर्मी को मौके पर भेजा। सरदार सिंह चौहान ने द यंग भारत को बताया कि नहर की खुदाई और सफाई की जरूरत थी। उन्होंने कहा कि वे कोशिश करेंगे कि इन प्रवासी मजदूरों को उनकी मेहनत का हक वे दिलवा सकें। यदि ग्राम विकास विभाग ने पहले से माह अप्रैल, मई और जून में ग्रामीणों की समस्याओं को समझा होता और उसके हिसाब से सरकार की नीतियों पर अमल किया होता तो प्रवासी मजदूरों को इस तरह से श्रमदान के आगे न आना पड़ता। प्रवासी मजदूरों का कहना है कि जिस तरह से इस क्षेत्र में मनरेगा के कामों का कागजी करण हो रहा है। जिस तरह से बरसात आने को हो गयी है और नहरें पहले से खोदी नहीं गयी हैं, नालियां व्यवस्थित नहीं की गयी हैं। इसीलिए प्रवासी मजदूरों को अपने विरोध का पैटर्न चेंज करते हुए उसे सकारात्मक करना पड़ा। और ग्राम विकास विभाग यदि घरार नदी पर हमारे श्रमदान को जबरियां मनरेगा के काम बता रहा है। मजदूरों ने कहा मनरेगा तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर शुरू की गई योजना है ना। तो जो महापुरुष(महात्मा गांधी) जीवन भर सत्य और अहिंसा के लिए लड़ता रहा तो हम मजदूर अपने राष्ट्रपिता के रास्ते पर चलते हुए ग्राम विकास विभाग द्वारा एक कार्य पर की गई बेईमानी का जवाब हम महात्मा गांधी के सकारात्मक सिद्धांत पर चलते हुए 6 जगहों पर नहर और नालियों की खुदाई और सफाई श्रमदान के माध्यम से करते हुए हम उन्हें बेईमानी और जबरदस्ती का जवाब प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता के माध्यम से दे रहे हैं। ग्राम विकास विभाग के अन्याय के खिलाफ ये सकारात्मकता की चिंगारी हम सभी प्रवासी मजदूर जिले भर के गांव में श्रमदान की अलख जगाकर सही जवाब देंगे।
संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.
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