चाटुकारिता पत्रकारिता नहीं है

संविधान के अनुच्छेद 19(1)(अ) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की व्यवस्था दी गई है

संविधान 19(2) में उसकी सीमाएं तय करदी गईं हैं

अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

दिल्ली। चाटुकारिता किसी भी हालत में पत्रकारिता नहीं कही जा सकती। चाहे वो सत्ताधीषों के लिए हो, अधिकारी वर्ग के लिए हो, फिल्मवालों के लिए हो या माफिया के लिए होशियारी से लिखी गई हो। चाटुकारिता को किसी भी तरह से निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं कहा जा सकता। आजकल देश और दुनियां में करोना महामारी की घटनाएं तेजी से बढ़ रहीं हैं। लेकिन गरीब आदमियों के लिए कोरोना का प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराना कठिन ही नहीं बहुत मुश्किल भी है। मीडिया और सरकार प्राइवेट अस्पतालों के मालिकों पर संवेदना के स्तर पर यह दवाब नहीं बनाता कि कोरोना महामारी में अमीरों के साथ साथ गरीबों को भी प्राइवेट अस्पतालों में सहज और सुलभ इलाज मिल जाए। जो उनकी आर्थिक स्तर के भीतर का हो। क्यों कि यह महामारी गरीब और अमीर में भेद नहीं करती। चूंकि यह महामारी है तो महामारी में सरकार का धर्म है कि अमीर और गरीब के बीच इलाज में भेदभाव नहीं होना चाहिए। लेकिन इस तरह की खबरें मीडिया में कम हैं जो सरकार और प्राइवेट अस्पताल के मालिकों को गरीबों के प्रति इस महामारी में संवेदनशील बनाने का काम करें।
अभी तक कोरोना महामारी की वैक्सीन नहीं बनी है। कोई निश्चित इलाज भी नहीं है। लेकिन यदि किसी को कोरोना हो जाता है तो उसके परिजन भी उस व्यक्ति का साथ छोड़ देते हैं। यहां तक कि उसके अंतिम सरकार में भी दूरी बना लेते हैं। कोरोना को लेकर समाज में जो भय फैला हुआ है। उसको दूर करने के लिए सरकार और मीडिया को क्या कुछ नहीं करना चाहिए? हर साल जिस तरह से असम बिहार तथा कई राज्यों में बाढ़ का प्रकोप होता है। हजारों लोगों की गृहस्थी चैपट हो जाती है, घर से बेघर हो जाते हैं, हजारों लोग मर जाते हैं। मीडिया में यह मेन खबर नहीं बनती, साइड स्टोरी की तरह चलाई जाती है। क्या मीडिया की भूमिका यह नहीं होना चाहिए कि हर साल इस भयानक बाढ़ के प्रकोप से आदमी को कैसे मुक्ति मिले।

इसी तरह राफेल युद्धक विमान हो फ्रांस से खरीदा गया है। उसके बारे में विस्तार से एक एक टैक्नोलाजी की जानकारी देना न तो देश हित में जरूरी है और न ही दुश्मन देशों को देना जरूरी है। लेकिन दिन दिन भर इलेक्ट्रानिक मीडिया यही खबरें विस्तार से दिखा रहा है। इसी तरह फिल्म अभिनेता सुषांत सिंह राजपूत के बारे में जो इलेक्ट्रानिक मीडिया कोर्ट ट्रायल कर रहा है। यह गलती पहले भी डा0 तलवार के मामले में कर चुका है। इसी तरह अयोध्या में भव्य श्रीराम मन्दिर शिलान्यास की खबर देना जरूरी है, लेकिन कई दिन पहले से कई मीडिया चैनल अयोध्या में डेरा डालकर 24 घण्टे के लाइव प्रसारण दिखा रहे हैं। इससे पत्रकारिता के उच्च मानदंड कहां से पूरे हो रहे हैं।
आज पूरा देश कोरोना महामारी के कारण पैदा हुई आर्थिक तबाही, बेरोजगारी, महानगरों से लाकडाउन के दौरान अपने घरों में वापस आए लाखों मजदूर रोटी रोजी के लिए परेशान हैं। फिल्मों और टीवी में काम करने वाले स्ट्रगलर भी इस काल में भीख मांगने को मजबूर हैं। लेकिन इस तरह की खबरें प्रमुखता से नहीं आती। महानगरों से कोरोना महामारी के कारण लाखों प्रवासी मजदूर जो अपने अपने गांव में आए उनमें से तमाम मजदूर रोजगार न मिलने के कारण भटक कर अपराध की राह में चले गए। इसकी चर्चा करना भी टीवी चैनल व मीडिया जरूरी नहीं समझता।
पिछले कुछ सालों से गोवा, मप्र, राजस्थान में इसके पहले कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के जमाने में सत्ता पाने और सत्ता से बेदखल करने के लिए जो हार्स ट्रेडिंग का दौर शुरू हुआ, वह आज भी जारी है। इसकी गहराई से पड़ताल करना और सच्चाई जनता के सामने खोलकर रख देने में मीडिया की रुचि नहीं रही है। वह तो सत्ताधीषों के इशारे पर खबर को घुमाने की भूमिका निभा रहा है। इसी तरह लोकतंत्र में राज्यपाल की भूमिका क्या हो इसकी चर्चा गहराई से चैनलों और प्रिंट मीडिया में नहीं हो रही है। जिस तरह की आज पत्रकारिता हो रही है उसे चाटुकारिता भरी पत्रकारिता से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(अ) में अभिव्यक्ति की आजादी की व्यवस्था दी गई है। अभिव्यक्ति की आजादी उसी व्यवस्था से निकलती है। इस आजादी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुत से फैसलों में सही ठहराया है। 1950 में ब्रज भूषण बनाम दिल्ली राज्य और 1962 में सकाल पेपर्स प्रा0 लि0 बनाम यूनियन आफ इण्डिया के फैसले में प्रेस की अभिव्यक्ति की आजादी को मौलिक अधिकार की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद19(2) में उसकी सीमाएं तय करदी गईं हैं। संविधान में लिखा है कि अभिव्यक्ति की आजादी भारत की संप्रभुता और अखण्डता राज्य की सुरक्षा और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों के अथवा न्यायालय अवमानना, मानहानि या अपराध उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्वहन हो। यानि प्रेस की आजादी मौलिक अधिकार के तहत कुछ भी लिखने की आजादी नहीं है। यह सही है कि सत्ता में बैठे लोग इस आजादी को गैर संवैधानिक तरीके से कुचल भी देते हैं। सरकारी आदेश पर अन्य तरीकों से पत्रकारों पर हमले होते हैं। पत्रकारों को सही खबर देने की कीमत अपनी जान देकर भी चुकानी पड़ती है। इन्दिरा गांधी ने यह गलती 1975 में की थी। इमरजेंसी में सेंसरशिप लगा दी थी। सरकार के खिलाफ कोई खबर नहीं छप सकती थी। टीवी व रेडियो पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में थे। उनके पास जाने वाले सभी चापलूस होते थे। इसलिए सही खबरों का जनता को पता ही नहीं चलता था। नौकरशाही ने इन्दिराजी को बता दिया था कि देश में उनके पक्ष में बहुत ही भारी माहौल है। वे दुबारा आराम से चुनाव जीत जाएंगी। इसलिए इन्दिराजी ने 1977 के चुनाव करवा दिए। जिसमें कांग्रेस बुरी तरह हारी तथा इन्दिरा गांधी और संजय गांधी भी चुनाव हार गए। चापलूसी भरी पत्रकारिता सत्तारूढ़ पार्टियों की सबसे बड़ी दुष्मन है। वह सत्य पर पर्दा डालती है। सरकार गलत और सही में भेद नहीं कर पाती। इसलिए सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वह लोकतंत्र में ऐसा माहौल पैदा करे कि निष्पक्ष बनकर निडरता से खबरें लिखे। लोकतंत्र में सरकारों को चापलूस पत्रकारों से पिण्ड छुड़ाना चाहिए। सरकार और प्रशासनिक तंत्र केा चाहिए कि वह पत्रकारों के सवाल पूछने के अधिकार की आजादी को सुनिष्चित करे। पत्रकारिता के लिए लोकतंत्र कर्तव्यपरायणता और राष्ट्रहित, लोकहित और समाजहित में हो वही सच्ची पत्रकारिता है।

संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.

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वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय शेष नारायण सिंह एवं राम दत्त त्रिपाठी को आदर सहित