जालौन मे पुलिस की अंधेरगर्दी-मृतक के विरूद्व भी दर्ज हुयी रिपोर्ट

मृतक हरिओम की फाइल फोटो

अवैध बसूली के मामले मे 30 आरोपियों के विरूद्व हुयी एफआईआर मे एक नामजद की हो चुकी है मृत्यु, एक और है 100 प्रतिशत अंधा

बिना जांच पड़ताल के दर्ज हो रही एफआईआर का है यह नतीजा

पुलिस अपने आप उड़वा रही है विभाग की खिल्ली

चाट का ठेला लगाने वाले पैरों से दिव्यांग वादी ने लिखवाई है पांच लाख की बसूली की एफआईआर

उरई(जालौन): जनपद के जालौन कोतवाली मे एक ऐसा मुकदमा दर्ज किया गया है कि जिसको जानने के बाद लोग हैरत मे है और पुलिस का चैतरफा मजाक बन रहा है। क्योंकि 30 नामजद एवं सात अज्ञात के खिलाफ जो एफआईआर दर्ज करायी गयी है उसमे एक पैरों से दिव्यांग चाट वाले ने 23 लोगों को नेम्ड कराया है तथा 7 अज्ञात आरोपी बताए गये है। हैरतअंगेज बात यह है कि जो नेम्ड अभियुक्त है उनमे से हरीओम की 18 जून 2019 को मृत्यु हो चुकी है तथा रमेश चन्द्र आंखों से पूरी तरह यानी 100 प्रतिशत दृष्टिहीन है तो समझने की बात यह है कि चाट वाले से पांच लाख की अवैध बसूली की धमकी देने के लिये एफआईआर के अनुसार जो कुल 30 लोग आरोपित हैं। जिनमे से 23 को नाम दर्ज कराया गया है जबकि 7 अज्ञात है। इन्ही नामदर्ज आरोपियों मे एक मृतक और एक अंधा शामिल है। तो सबाल यह कि पुलिस कैसे इतनी गंभीर प्रकृति के कार्यों को जालौन मे अंजाम दे रही है।
100 प्रतिशत दृष्टिहीन रमेश चन्द्र की फोटो
पुलिस अधीक्षक डा.यशवीर सिंह से सभी आरोपी एवं उनके शुभ चिन्तकों ने यह मांग की है कि जब हरिओम की मृत्यु वर्ष 2019 मे ही हो चुकी है और रमेशचन्द्र पूर्णतयः दृष्टिहीन है तो मृतक और दृष्टिहीन भला अवैध बसूली में योगदान कैसे कर सकते हैं? यह बात अविश्वसनीय प्रतीत होती है क्योंकि चाट वाला कोई पैसे वाला नही है। उससे पांच लाख रूपये देने की धमकी देने का निष्पक्ष नजरिए से कोई औचित्य समझमे नही आता। एसपी से पूरे प्रकरण की गंभीरता से जांच कराने की मांग करते हुए लोगों ने यह भी “यंग भारत” को बताया कि चूंकि ये पुरानी कई रंजिशों की ऐसी गुत्थी है जो बराबर एफआईआर के रूप मे सामने आकर पुलिस का वक्त वर्बाद करती है। किन्तु सबसे जिम्मेदार और संवेदनशील कार्यो को अंजाम देने के लिये बने पुलिस विभाग को कम से कम यह तो रिपोर्ट लिखते वक्त यह तो देख ही लेना चाहिये कि इनमे से कोई आरोपी मृतक हो चुका है और एक अन्य पूर्णतयः दृष्टिहीन है। कहने वाले तो यह भी कह रहे है कि बहुत सारी एफआईआर तो पीड़ितो के गिड़गिड़ाने के बाबजूद भी थाना और कोतवालियों मे दर्ज ही नही की जाती है तो यह 30 आरोपियों के विरूद्व देखने मे ही सन्दिग्ध लगने वाली एफआईआर तत्काल कैसे दर्ज कर ली गयी। अगर इसमे एफआईआर लिखने से पहले कोई जांच की गयी है तो वह किसने की। क्योंकि यह तो आंखो मे पटटी बांध कर किया जाने वाला काम लगता है और यदि जांच करने के उपरांत यह एफआईआर दर्ज की गयी है तो कौन है वे जांच अधिकारी। जिन्होने ऐसा हैरतअंगेज मुकदमा अपनी जांच के बाद दर्ज कराया है।
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