जिस डाक्टर के खिलाफ शिकायत की, उच्च अधिकारियों ने उसी डाक्टर के बाॅस मेडिकल कालेज की प्रिन्सपल को जांच सौंप दी
जनसूचना अधिकार का मामला
अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेष द्विवेदी
झांसी। बुण्देलखण्ड कालेज झांसी की जिस डाक्टर के खिलाफ जनसूचना के अधिकार के तहत शिकायत की गई, महानिदेशक ने उसकी जांच उसी मेडिकल कालेज की तत्कालीन प्रिन्सपल और डाक्टर की बाॅस डाॅ साधना कौशिक को दे दी। जिसके कारण पीड़ित को न्याय तो नहीं मिलना था सो नहीं मिला, यह है तंत्र की अन्तर्कथा।
किसी भी पीड़ित और ईमानदार व्यक्ति के लिए इस मजबूत भ्रष्ट तंत्र से न्याय पाना कितना कठिन है यह कथा बताती है।
जनसुनवाई के अधिकार के तहत झांसी निवासी मुदित चिरवारिया ने प्रदेश के महामहिम तत्कालीन राज्यपाल, महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण लखनऊ, प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा को भेजे अपने शिकायती पत्र में बताया था कि महारानी लक्ष्मीबाई चिकित्सा महाविद्यालय के डाक्टरों को नान प्रैक्टिस एलांउस के रूप में हजारों रुपए अतिरिक्त मिल रहे हैं। जनसूचना अधिकारी के तहत एनपीए लेने वालों की 26 नवंबर 2016 तक जांच नहीं की गई। झांसी मेडिकल कालेज के एनपीए लेने वाले अधिकांश डाक्टर खुलेआम प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। इसका गवाह झांसी मेडिकल कालेज के ठीक सामने सैकड़ों की संख्या में जो प्राइवेट नर्सिंग होम चल रहे हैं। उनमें से तमाम मेडिकल कालेज में कार्यरत प्रोफेसरों और डाक्टरों के हैं। जिन डाक्टरों के प्राइवेट नर्सिंग होम नहीं हैं, उनमें से अधिकांश प्राइवेट नर्सिंग होमों में अपनी मेडिकल कालेज की ड्यूटी के बाद खुलेआम प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। वर्ष 2016 तक मेडिकल कालेज में सिटीजन चार्टर भी लागू नहीं किया गया है। इसकी जांच की जाय, यदि जांच टीम पीड़ित प्रार्थी मुदित चिरवारिया की मदद ले तो वे मदद करने को तैयार हैं।
शिकायती पत्र में मुदित चिरवारिया ने बताया है कि वह अपनी पत्नी श्रीमती शिवानी को मेडिकल कालेज की डाक्टर सुशीला खरकवाल को दिखाना चाहा तो उन्होंने नहीं देखा। अपरान्ह 3 बजे उन्होंने अपने बंगले में फीस लेकर मेरी पत्नी को देखा। बात डिलेवरी की आई तो उन्होंने प्राइवेट नर्सिंग होम में कराने का दवाब बनाया। जब प्रार्थी ने मेडिकल कालेज में ही डिलेवरी कराने की बात कही तो डाक्टर ने उसे भगा दिया। इसकी शिकायत उसने मेडिकल कालेज की तत्कालीन प्रिंसपल डा0 साधना कौशिक से की तो डा0 साधना कौशिक ने डा0 सुशीला खरकवाला से स्पष्टीकरण मांगा तो डा0 खरकवाल ने चिरवारिया की शिकायत को बिना किसी जांच के झूठा बता दिया। हद तो तब हो गई जब उन्होंने प्रिंसपल डा0 साधना कौशिक की इस कार्यवाही की शिकायत प्रदेश के महानिदेषक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं प्रशिक्षण उप्र से आरटीआइ के माध्यम से 26 नवंबर 2015 को तथा 27 जून 2016 को की।
इसके बाद महानिदेषक ने अपने 4 जून 2016 को भेजे विभागीय पत्र में झांसी मेडिकल कालेज की प्रिंसपल को लिखा कि मुदित चिरवारिया ने जो शिकायत की है तथा जो प्रथम अपीलीय अधिकारी होने के नाते आपको छाया प्रतियां और संलग्न प्रार्थना पत्र भेजे थे उन्हें इस अनुरोध के साथ प्रेषित कर रहा हूं कि आप स्वयं मेडिकल कालेज झांसी की प्रथम अपीलीय अधिकारी नामित हैं। अतः आवेदक को वांछित सूचनाएं उपलब्ध कराते हुए प्रकरण का निदान करने का कष्ट करें और कृत कार्यवाही से शासन तथा इस कार्यालय को अवगत कराने का कष्ट करें। यह है तंत्र की अन्तर्कथा जिसमें पीड़ित व्यक्ति जिससे न्याय की उम्मीद करता है वह उसी आरोपी का बॉस है और पहली बार न्याय मांगने पर वही प्रिंसपल उसे कोई न्याय नहीं देता है। जबकि दूसरी बार उच्च अधिकारी और प्रदेश के महानिदेषक स्वास्थ्य एवं शिक्षा उसी आरोपी डाक्टर की बाॅस और मेडिकल कालेज की प्रिंसपल डा0 साधना कौशिका को फिर से वही जांच देकर समस्या का निदान करने को कह देते हैं। जिससे पीड़ित व्यक्ति हक्का-बक्का रह जाता है।