धार्मिक आस्था के साथ साथ वैज्ञानिक महत्व से जुडा कार्तिक स्नान

पंरापरा के निर्वाहन में महिलायें दिखा रही उत्साह
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उरई(जालौन)। सदियों से चली आ रही कार्तिक स्नान की परंपरा को आज भी आस्थावान महिलाये पूरी सिददत के साथ मनाकर जहां एक ओर स्वस्थ और खुशहाल जीवन का संदेश दे रही है तो वही इसके वैज्ञानिक महत्व को भी बरकरार बनाये है।
गौरतलब हो कि आज के बदले सामाजिक परिवेश में पुरानी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को आधुनिक जीवन शैली ने खासा प्रभावित कर दिया है बाबजूद इसके महिलाओं का एक वर्ग ऐसा है जो आज भी उन्हें जीवित बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है यू तो कार्तिक स्नान की पंरपरा को लेकर ग्रामीण अचंलों में अधिक उत्साह देखने को मिलता है अपितु नगरीय क्षेत्रों में भी इसके महत्व को आस्थावान महिलाये बरकरार बनाये हुये है। कार्तिक स्नान क्या होता है और इसके धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है इस बारें में जानकारी देते हुये कार्तिक स्नान की परंपरा का निर्वाहन करने वाली महिलाओं ने बताया कि यह स्नान की परंपरा शरद पूर्णमासी से प्रारंभ होकर पूरे एक माह बाद कार्तिक पूर्णमासी के दिन तक रहती है इन दिनों में व्रत रखने वाली महिलायें सूर्योदय से पूर्व स्नान करने के बाद भगवान श्री क्रष्ण और राघा की पूजा गीतों को गाकर पूरें उत्साह के साथ करती है ब्रहम मुर्हूत में किये गये स्नान और ईश्वर की आराधना से उन्हें आत्मिक शक्ति की अनुभूति होती है। कार्तिक स्नान की परंपरा में तुलसी के विवाह की रश्म भी निभाई जाती है जिसमें तुलसी की शादी शालिगराम के साथ पूर्ण विधि विधान के साथ सम्पन्न करायी जाती है कार्तिक माह के आखिर में पूर्णमासी के दिन तुलसी के विवाह को सम्पन्न कराया जाता है। यह भी बताते चले कि प्रात सूर्योदय से पूर्व स्नान करने के पीछे वैज्ञानिक धारणा है। कि इससे तमाम शारीरिक बीमारियों का स्वत निवारण तो होता ही है साथ ही उर्जा का संचरण का लाभ भी प्राप्त होता है।
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