नोबल पुरस्कार विजेता कैलाष सत्यार्थी ने सीएम से भरतकूप में मासूम लड़कियों के शोषण पर न्याय दिलाने की मांग की

अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

दिल्ली। नोबल पुरस्कार विजेता कैलाष सत्यार्थी ने चित्रकूट जनपद के भरतकूप क्षेत्र में मासूस लड़कियों, जिनकी उम्र 10 से 18 वर्ष है। जो इस क्षेत्र के लगभग 50 क्रैषरों तथा पहाड़ों में पत्थर तोड़ने की मजदूरी का काम करती हैं। दबंग ठेकेदारों पर उन मासूमों के शारीरिक शोषण के आरोप लगे हैं। यह खबर बेहद शर्मनाक है। श्री सत्यार्थी ने कहा कि जिनके बारे में ये बातें हो रहीं हैं, वे बेहद गरीब और वंचित परिवारों से हैं। क्या गरीबी और गैर बराबरी आपने आप में हिंसा नहीं हैं और अपराध नहीं हैं? पिछले कुछ सालों में पीड़ित और उपेक्षित बच्चों के लिए ढेरों अच्छे कानून बने हैं। इसका श्रेय केन्द्र की मौजूदा सरकार को जाता है। यदि इन योजनाओं और कानूनों के तहत सभी बच्चों को आजादी, सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा नहीं मिलती, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?
उन्होंने कहा कि क्रियान्वयन और नतीजे की जवाबदेही सुनिष्चित किए बगैर कोई व्यवस्था ठीक से कैसे चल सकती है। मप्र और उप्र में पड़ने वाला बुन्देलखण्ड का इलाका देश के पिछड़े इलाकों में से एक है। मेरे पूर्वज बुंदेलखण्ड के ही हैं। मैं खुद इस इलाके से खूब अच्छी तरह से परिचित हूं। मैंने कोल, सहरिया, सौर और अन्य जनजातियों में व्याप्त गरीबी और भुखमरी देखी है। जिनमें से कई बंधुआ मजदूरी और ट्रैफिंग के शिकार हैं। हमारे संगठन के कोषाध्यक्ष लक्ष्मण मास्टर और बाल आश्रम के प्रधान शिक्षक उन्हीं में से हैं, जिन्हें हमने 35-36 वर्ष पहले हरियाणा की पत्थर की खदानों से बंधुआ मजदूर के रूप में मुक्त कराया था। इसके अलावा हमने तमाम बंधुआ मजदूर परिवारों को मुक्त कराया है। कानूनी लड़ाइयां लड़ी हैं। खदान माफियाओं के साथ स्थानीय राजनेताओं, प्रशासनिक अफसरों और पुलिस की मिली भगत को देखा है और उसके दंष को भोगा भी है।
चित्रकूट की घटना के मामले में यदि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं पहल करें, तो बहुत दूरगामी, व्यापक परिणाम मिल सकते हैं। प्रदेष में कहीं भी बच्चों के साथ दुराचार करने वाले डरेंगे और सरकार पर पीड़ितों का भरोसा बढ़ेगा। इस मामले में उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराने से भी सरकार का फायदा होगा। अगर मीडिया रिपोर्ट झूठी पाई जाती है तो सरकार की जीत है। लेकिन सच पाए जाने पर यदि दोषियों को सख्त सजा दे दी जाए तो यह और भी बड़ी जीत है। शासन में न्याय की राजनीति में न्याय की ही विजय होगी। सत्य को स्थापित करने और स्वीकार करने के साहस से ही राजनैतिक नेेतृत्व, नैतिक नेतृत्व में बदलते हैं।