पहली बार दिखी मतदाताओ की अनोखी नाराजगी, नीतीश से नाराज ,लेकिन भाजपा की भर दी झोली

अनिल शर्मा + संजय श्रीवास्तव + राकेश व्दिवेदी
पटना। पत्रकार के रुप मे हम लोगो ने पहली बार ऐसा विधान सभा चुनाव देखा है। अमूमन देखा गया है कि जिस पार्टी का मुख्यमंत्री होता है यदि मतदाता की नाराजगी उससे है तो फिर चाहे उसके गठबंधन मे जो भी दल हो मतदाता का गुस्सा सीएम के साथ पूरे गठबंधन के साथ एक जैसा होता है। जैसे पिछले समय पंजाब मे हुए विधानसभा चुनाव में धान से बर्बाद हो रहे पंजाब के युवाओं को लेकर अगर मतदाता अकाली दल से नाराज थे तो उसका असर उसके गठबंधन की पार्टी भाजपा के साथ भी एक जैसा ही हुआ। यानि अकाली दल कांग्रेस से बुरी तरह हारी तो मतदाताओ ने वैसी दशा उसके गठबंधन के साथ ही दल भाजपा के प्रत्याशियो की भी हुई। लेकिन बिहार विधानसभा का इस बार का चुनाव अनोखा था। जब महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी युवा तेजस्वी यादव ने जैसे ही सरकार आने पर 1000000 नौकरी युवा बेरोजगारों को देने की बात की घोषणा की तो माहौल उनके पक्ष में बनने लगा। इसमें उनके पक्ष में माहौल दबाव और जुड़ गया। जब तेजस्वी यादव ने जगह-जगह जनसभाओं में कोरोना काल के दौरान हुए लाकडाउन में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने परिवार के साथ आने वाले प्रवासी मजदूरों की तकलीफों का दर्द बयान करके युवाओं और मजदूरों का दिल जीत लिया था। जिसके कारण तेजस्वी की सभाओं में चुनाव के दौरान दिन प्रतिदिन भीड़ बढ़ती जा रही थी। इसमें एक बात और जुड़ गई कि जो महिलाएं नीतीश बाबू की शराब बंदी के समर्थन में दो बार सड़क में उतर कर उन्हें जोरदार ढ़ंग से सत्ता में बैठा चुकी थी वह इस बार नाराज थी। क्योंकि शराब बंदी के बावजूद बिहार में शराब माफियाओं द्वारा घर-घर में बड़ी आसानी से शराब पहुंचाई जा रही थी।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से युवा बोर्ड रोजगार इसलिए और भी ज्यादा खफा हो गया कि उन्होंने तेजस्वी के 10 लाख युवाओं को रोजगार देने की घोषणा का मजाक उड़ाया और कहा कि क्या बजट आसमान से आएगा। लेकिन भाजपा ने इस खतरे को भांपते हुए तत्काल 1000000 की जगह 19 लाख युवाओं को रोजगार देने का की घोषणा कर डाली। जिससे भाजपा के पक्ष में माहौल बनने लगा। लेकिन जितने भी सर्वे इस दौरान आए या ओपिनियन पोल आए उसमें महागठबंधन की सरकार बनती हुई सभी को नजर आई। लेकिन मतदाता सबसे ऊपर हैं उसने ओपिनियन पोल और सर्वे को गलत साबित कर दिया और नीतीश बाबू से अपनी गुस्सा का इजहार करते हुए जदयू की सीटें जाकर कम कर दी। वहीं भाजपा का जो उसी राजद का गठबंधन का हिस्सा था उसे झोली भर भर के वोट दिए और राजद में बीजेपी सबसे बड़ा दल बन कर उभरा है। बहरहाल यह भी साबित हो गया कि बीजेपी के नेता चाहे विधान सभा का चुनाव या फिर लोकसभा का उनके चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए अब भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ही एक मात्र जादुई व्यक्तित्व है और देश मे पिछले कई चुनाव मे श्री मोदी अपना रणनैतिक कौशल, हाजिर जवाबी और नई योजनाओ के दम मतदाताओ को हर बार मतदाताओ को भाजपा और एनडीए पक्ष मे करने मे सफल होते रहे है।
बिहार विधानसभा का यह चुनाव देश मे हुए अब तक के चुनाव मे अनोखा इसलिए है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 15 साल के शासन के खिलाफ भीषण नाराजगी के बावजूद मतदाताओ ने एनडीए के ही घटक दल भाजपा को निर्दोष माना। इसलिए भाजपा की झोली वोटो से खूब भर दी। लेकिन इसके पीछे भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठनो के पदाधिकारियो और कार्यकर्ताओ ने सत्ता के खिलाफ नाराजगी से होने वाले डैमज को कंट्रोल कर भाजपा के साथ भाजपा के मात्र संगठन आरएसएस ने एक वर्ष पहले ही ग्रासरुठ पर योजना बना कर काम करना शुरु कर दिया था। जिस का परिणाम बिहार चुनाव के परिणाम। जहां जदयू को तो नुकसान हुआ लेकिन भाजपा पांच साल पहले 53 विधायको की पार्टी मे होती थी। इस चुनाव मे उसकी संख्या बढ़ कर 73 हो गई है। इसलिए इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव मे यही अनोखापन रहा है जो पहली बार ऐसा भी हुआ है।
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