पिंक कैसे बना महिलाओं का रंग…

प्रस्तुति-संजय श्रीवास्तव(प्रधानसम्पादक)

नारी शताब्दियों से अपनी पहचान के लिए संघर्षरत है ,कहीँ अपने अस्तित्व के लिए तो कहीँ अपने अर्थ के लिए। कहीं पद के लिए तो कहीं प्राप्य के लिए,कहीं बिखरे कड़ियों को जोड़ने के लिए तो कहीं खुद को बिखर जाने से बचाने के लिए,और सबसे बड़ी बात..अपनी सुरक्षा के लिए। केवल भारतीय नारी ही नही बल्कि वैश्विक नारी यह लड़ाई लड़ रही है ।
अभी उसका प्राप्य लक्ष्य से सदियों दूर है किन्तु उसे इस दौर मे एक ऐसे रंग की पहचान मिली जिसे देखते ही पुरुष समाज थवैश्विक नाम ही इस समय “नारी” का पर्याय बना हुआ है ।महिला यौन हिंसा पर “पिंक” फिल्म बनी,ब्रेस्ट कैंसर का चिन्ह “पिंक रिबन” बना, “पिंक पुलिस” थाने /चौकियां बनी,पिंक ट्वायलेट बने,,पिंक कपड़े, ब्यूटी आइटम, खिलौने, बेबी ड्रेसेज़ ,शूज, ट्वायलेट्रीज, डिस्पोजेबल्स, मोबाइल्स आदि बने, पिंक कलर डे सेलिब्रेसन्स होने लगे एवं नारी के जीवन जीने के हर क्षण की आवश्यकता चाहे वह व्यक्तिगत हो ,सार्वजनिक हो या नितांत निजी पल से जुड़ी हो सभी ने पिंक रंग ले लिया ।
अब हम ये देखेंगे कि आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई। इतिहास के समुद्र को बार बार मथने पर जो परिदृश्य सामने आता है वह इंगित करता है कि पिंक मे नारी की छवि देखने का गर्भकाल फ्रांस में और यौवन काल अमेरिका मे रहा। पिंक विकिपीडिया के अनुसार अमेरिका एवं यूरोप मे ईवा हेलर, प्रोफेसर-मनोविज्ञान-समाजशास्त्र एवं कम्युनिकेशन-जर्मनी, ने वर्ष 2005 मे लगभग 2000 लोगों पर एक सर्वे कर रिसर्च किया जिसका विषय था “The psychology of colour–how colour works on feelings and reason”। उनके रिसर्च से यह निष्कर्ष निकला कि “पिंक रंग –प्रसन्नता (charm) ,नम्रता (politness), सुकुमारता (tenderness ), मधुरता (sweetness), कोमलता (sensitivity) एवं नारीत्व (femininity) के गुणों से जुड़ा होता है।” प्रकृति ने भी नारी को इन गुणों से परिपूर्ण बनाया है इसलिए एक दुसरे का पर्याय बनना भी प्राकृतिक है।
फ्रांस की एक महत्वपूर्ण हस्ती थीं मैडम डी पम्पाडोर जो 1745 से 1764 तक किंग लुइस xv की चीफ रायल मिस्ट्रेस थीं और उन्हें सरकारी तौर पर महारानी के waiting लाईन मे 13वाँ स्थान प्राप्त था जो कोर्ट के लिए भी सम्मान से भरा एक पद था। वह बहुत ही सुन्दर व प्रतिभाशाली महिला थीं जिनकी कोर्ट के कार्यवाहियों पर अच्छी पकड़ थी ओर वह किंग लूईस xv की विश्वस्थ मित्र व मुख्य सलाहकार भी थीं। उनकी फाईन आर्ट्स और कल्चर मे बहुत रुचि थी और एक तरह से वह फ्रांस मे उस की मुख्य संरक्षिका थी जिनकी पेरिस को पूरे यूरोप मे कला और संस्कृति की राजधानी बनाने मे केन्द्रीय भूमिका थी। पोर्सलीन के वस्तुओं पर कसीदाकारी व कलाकारी की वह विशेष जानकार थी और इतनी अधिक रुचि थी कि उन्होने यूरोप की मशहूर पोर्सलीन की “Sevres” की फैक्ट्री खरीद ली थी जो बाद मे रायल फैक्ट्री बनी। पिंक कलर उनका पसंदीदा रंग था,उन्होंने पोर्सलीन(सिरेमिक,चीनीमिट्टी) के हजारों तरह की डिजाइनिंग की जो डाईनिंग ,इंटिरियर ,बड़े शो पिसेज,पोर्टेट, आदि से जुड़ा था जो पिंक कलर मे था या उसके करीब था। यहां तक कि कोर्ट मे भी इसे सजाया गया, इंटीरियर पोर्सलीन गार्डेन बना जिसमें रोज फ्लावर ऐसा बना था कि राजा पहली बार देखते वक्त उसे तोड़ना चाह रहे थे तो उन्हें बताया गया। ये विलासिता से जुड़ी वस्तुएं थी जो फ्रांस के अभिजात्य वर्ग मे रोज पम्पाडोर “Rose Pompadour” या पम्पाडोर पिंक “Pompadour Pink” के नाम से प्रसिद्ध हो गयी ओर यह पिंक कलर status symbol ओर फैसन आइकन बन गया और अभिजात्य नारियों के लिए एक आकर्षण का केन्द्र बन गया।
इसका दूसरा चरण हेनरी ई. हटिंगटन जो अमेरिका के अरबपति व्यापारी थे उनसे शुरु होता जिन्होंने उस समय की मशहूर पेन्टिंग ” द ब्लू ब्वॉय ” जिसे थामस गेन्सबोरो ने और “द पिंकी” को थामस लारेन्स ने बनाया था ,दोनो को 1920 मे खरीद कर( द ब्लू ब्वॉय का मूल्य $725000) अपने लाइब्रेरी मे डिसप्ले किया था जो आज भी हटिंगटन लाइब्रेरी कैलीफोर्निया मे मौजूद है। मिडिया ने इस प्रकरण को काफी पब्लिसिटी दिया था और “पिंकी “के आँयल पेन्टिंग के पिंक ड्रेस का काफी प्रचार प्रसार हुआ और ब्लू कलर लडकों और पिंक कलर लड़कियों के लिए एक ट्रेन्ड बने लगा ।
पश्चिमी देशो मे पिंक रंग का वास्तविक नारीकरण उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द मे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शुरु हुआ जब ” मेमी पिंक ” कलर महिलाओं के लिए फैशन क्रेज बन गया किन्तु इसके पीछे क्या परिस्थितियां थी इसे देखना होगा। द्वितीय विश्वयुध्द 1945 मे समाप्त हुआ किन्तु सैनिकों की वापसी देर तक होती रही।द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ होने पर बहुत बड़े जनशक्ति की आवश्यकता थी जो केवल पुरुषों से पूरी नहीं हो सकती थी। सुप्रीम कमांडर आफ एलाइड फोर्सेस Dwight David Eisenhower जो बाद मे अमेरिका के राष्ट्रपति बने उन्होने कहा था कि महिलाओं के सहयोग के बिना युद्ध को जीतना सम्भव नही है,उन्हें या तो “फार्म “पर या “यूनीफार्म” मे या फिर “फैक्ट्री मे “काम करना होगा ता कि पुरुष मुख्य मोर्चे पर लड़ सके। परिणाम स्वरूप लगभग 75 % मैरेड, अनमैरेड सभी महिलाओं ने Women’s Land Army (farming), मेकेनिक, इंजीनियर, टैंक-फायर इंजिन-एम्बुलेंस ड्राइवर, जहाज (ship) निर्माण, बम एवं कारतूस फैक्ट्री, एयरक्रैफ्ट रिपेयरिंग, प्लम्बर, आफिस क्लर्क, नेवेल इंटेलीजेंस, रेडियो आपरेटर, फोटोग्राफर, नान कम्बैटिंग पायलट, लैब टेक्निशीयन, कोस्टगार्ड, और सबसे खतरनाक आर्मी नर्सिंग कार्प्स मे ( कींचड,उच्च ताप,फ्रीजिंग ठंड मे) कई बर्षों तक अपना योगदान दिया। विश्वयुद्ध के दौरान कपड़ो की राशनिंग की गई जिसका शिकार महिलाएं भी हुई और वो सारे फैशन से दूर फैक्ट्रियों मे कठोर,दूरूह व पुरुषोचित कामो मे लगी रहीं। राशनिंग मे परिवार के लिए सिमित संख्या में कूपन मिलते थे जिसमे साधारण कपड़ों से काम चलाना पड़ता । डबलब्रेस्ट कोट ,नायलान होजरी, सिल्क, लेदर आदि ऐसे वस्तुओं पर रोक लगा दी गई जिसकी जरुरत मिलिट्री को थी साथ ही कपड़ो की नाप, लम्बाई, चौड़ाई, गोलाई पर भी नियंत्रण लगा दिया गया ता कि मिलिट्री को कपड़ो और लेदर की कोई कमी न हो। ऐसे परिवेश से महिलाएं ऊबी हुई थीं किन्तु आत्मविश्वास बढा हुआ था और जब वो धीरे धीरे घर लौटी तो काफी दिनों बाद उन्हें अपने घर मे एक घरेलू (feminine) माहौल मिला,फैशन की आजादी मिली,घरों को ,अपने को सजाने का उन्मुक्त वातावरण मिला और फैशन की प्यास बुझाने की चाहत पूरी हुई। सुप्रीम कमान्डर Dwight D Eisenhower 1953 मे राष्ट्रपति बने जिनके पत्नी का नाम Mamie Geneva Eisenhower था जो अब फर्स्ट लेडी आफ अमेरिका थीं। मेमी पिंक इन्हीं की देन थी।
राष्ट्रपति आइजनहावर ने 20 जनवरीPolice Article # 001~~भारतीय दन्ड संहिता 1860 की पृष्ठभूमि और वर्तमान परिवेश मे उसमे परिवर्तन की आवश्यता:–
भारतीय दण्ड संहिता1860 का सृजन 6 अक्टूबर 1860 को किया गया किंतु इसे अन्तिम रुप से सृजित होने के पहले एक लम्बे दौर से गुजरना पडा़। इसके पहले हिन्दू कानून और मुस्लिम कानून अलग अलग थे। हिन्दुओं के लिए मनुस्मृति की स्थापित कानूनी व्यवस्था थी।मनुस्मृति के अन्तर्गत विभिन्न अपराधों को 18 अध्यायो मे बाँटा गया था जिसमे हमला, चोरी, लूट, झूठी गवाही, slander, criminal breach of trust, cheating, adultry, rape, gambling, criminal tresspass, etc आदि बिन्दु स्पष्ट रुप से समाहित थे।
वारेन हेस्टिंग्स, गवर्नर जनरल के प्रयास से बनारस के विद्वान पंडितों द्वारा एक हिंदू कोड बनाया गया जिसे “जेन्टू कोड “के नाम से जाना जाता था। उस समय मूल हिंदू धर्मावलम्बियों को यूरोपियन लोग जेन्टू हिन्दू कहते थे।सामान्य तौर पर मनुस्मृति की व्यवस्थाएं भा.द.सं. बनने तक चलती रहीं। मुगलों के आगमन के पश्चात मुस्लिम कानून लागू हुआ तब “दिवानी”और “फौजदारी” नामकरण प्रारम्भ हुआ।12अगस्त 1765 को गवर्रनर जनरल लार्ड क्लाईव ने दिल्ली के बादशाह से बंगाल, बिहार, और उडीसा की दिवानी व्यवस्था अपने हाथों मे ले ली और बाद मे बंगाल के सूबेदार से फौजदारी की “निज़ामत” व्यवस्था भी ले ली। महत्वपूर्ण कस्बों मे निज़ाम,नायब निज़ाम, फौजदार और कोतवाल पदाधिकारी होते थे जबकि दूरस्थ क्षेत्रों को मोफस्सिल क्षेत्र कहा जाता था ओर वहां सारी व्यवस्थाएं जमींदारों के हाथ मे थी। ये सारी व्यवस्थाएं 1858 तक चलतीं रहीं जब तक कि इन्डिया का सारा शासन इंग्लैंड की महारानी ,क्राउन या पार्लियामेंट ने न ले लिया।
18 अगस्त 1833 को चार्रटर एक्ट 1833 पास किया गया जो कानूनी क्षेत्र मे एक लैंडमार्क घटना थी, जिसके द्वारा पहली बार गवर्नर जनरल पद बना, ब्रिटिश इंडिया के लिये लेजिस्लेटिव कौंसिल का सृजन हुआ जिसे ब्रिटिश इंडिया के लिये कानून बनाने की शक्ति मिली ओर कौंसिल में कानूनी मामलों के लिए एक ला मेम्बर का पद बना जिस पर लार्ड थामस बेनिंगटन मैकाले पहली बार नियुक्त हुये। इसी चार्रटर मे प्रथम ला कमीसन भी बनाया गया जिसके प्रथम अध्यक्ष लार्ड मैकाले बनाये गये जिनके साथ तीन और सदस्य थे 1) सर जान मैकफर्सन मैक्लायड–मद्रास प्रेसीडेन्सी से,2)सर जार्ज विलियम एन्डरसन– बाम्बे प्रेसिडेंसी से,3) सर एफ मिलेट–कलकत्ता से। ला कमीशन का मुख्य काम कानूनों का संहिताकरण था,ऐसे संहिता का सृजन जो प्रेसीडेन्सी टाउन ओर मोफस्सिल क्षेत्र, हिन्दू मुस्लिम ओर सभी के लिए एक जैसा हो।लार्ड मैकाले ने ही प्रथम बार 1833 मे ब्रिटिश पार्लियामेन्ट मे यह मुद्दा उठाया था कि ब्रिटिश इंडिया के कानूनों मे एकरुपता होनी चाहिये क्योंकि भारत में मनुस्मृति, कुरान ओर विभिन्न ब्रिटिश रेगुलेसन्स से न्याय व्यवस्था चलायी जाती है जिसमें कानूनों की व्याख्या के लिए न्यायालयों मे का़जी ,मुल्ला और पंडित बैठते हैं और कानूनों की विरोधाभासी व्याख्या करते हैं जबकि मोफस्सिल क्षेत्रों मे कानूनी व्यवस्थाएं अलग हैं।1793 से 1834 तक बंगाल मे 675,मद्रास मे 250 ओर बाम्बे मे 259 ब्रिटिश रेगुलेसन्स लागू थे। इन परिस्थितियों मे संहिताकरण एक दूरूह कार्य था। दो सदस्य बिमार हो गये जिसके कारण मूल दायित्व मैकाले पर ही रहा। लगभग 3 सालों के अन्दर लार्ड मैकाले ने दि.14 अक्टूबर 1837 को भा०द०सं० का प्रारूप तैयार कर गवर्नर जनरल इन कौंसिल मे प्रस्तुत किया। इस संहिता को क्राउन/महारानी के विधिक सलाहकारों, विधिवेत्ताओं एवं बडे़ न्यायाधीसों को समीक्षा हेतु भेजा गया।
लार्ड मैकाले कौन थे यह जानना यहां समीचीन प्रतीत होता है।लार्ड टी०बी०मैकाले कानून की डिग्री लिए थे और बड़े विधिवेत्ता थे, ट्रीनिटी कालेज ,कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी
से चान्सलर गोल्ड मेडल मिला था,1826 मे उन्हें “रायल बार” मे बुलाया गया था। यहां उन्हें बुलाया जाता था जो रायल कोर्ट आफ इंग्लैन्ड मे बोलने के योग्य समझे जाते थे। दास प्रथा के विरूध्ध उन्होंने कई निम्बन्ध लिखे थे, इतिहास,पाश्चात्य साहित्य,राजनीति पर 10-12 किताबें लिखी थीं,पार्लियामेन्ट के मेम्बर थे,शिक्षाविद् और शिक्षा सुधार मे अग्रणी व्यक्तित्व थे, भारत मे फारसी हटाकर अंग्रेजी भाषा को सरकारी भाषा बनाने वाले,अंग्रेजी शिक्षा को भारत मे स्थापित करने वाले,पाश्चात्य संस्कृति को ही सभ्य मानने वाले व्यक्तित्व थे।
लार्ड मैकाले ने भा०द०सं० को तैयार करने के लिये सभी भारतीय कानूनों के अलावा इंगलैन्ड के कानूनों,फ्रांस के नेपोलियन कोड,अमेरिका के लेविन्गस्टन्स लूसियाना सिविल कोड आदि कानूनो का अध्ययन किया। नेपोलियन कोड वह कोड है जो फ्रांस की क्रांति के बाद 1804 मे 4 विधिवेत्ताओं के द्वारा सामन्तवादी कानूनों के विरुद्ध सामान्य नागरिकों के हित मे बनाया गया था। लूसियाना सिविल कोड भी नया ही था जो 1825 मे पुराने कानूनों के विरूद्ध बनाया गया था। इन दोनों ही कानूनों से मैकाले कोड प्रभावित था। यह कोड समीक्षा मे सालों लम्बित पडा़ रहा और 1845 तक उसकी कोई सुध नहीं ली गई क्योंकि1839 मे लार्ड मैकाले सेक्रेटरी आफ वार बनकर वापस इंग्लैंड चले गये।
26 अप्रेल 1845 को एक दूसरा कमीशन बनाया गया जिसके सदस्य थे 1) चार्ल्स हे कैमरान एवं 2) सर चार्ल्स एलफ्रेड इलियट ( दोनों पूर्व ला मेम्बर) और कोड की समीक्षा का कार्य इन्हें सौंपा गया। इस कमीशन ने दो पार्ट मे अपनी रिपोर्ट सौंपी -प्रथम दि०23 जुलाई 1846 को एवं द्वितीय दि०24 जून 1847 को। तीसरी बार पुनः इसकी समीक्षा के लिए गवर्नर जनरल इन कौंसिल के ला मेम्बर 1)जान इलियट बेथुन एवं 2) एवं सर बारनेस पीकाक, जो बाद मे प्रथम चीफ जस्टिस आफ कलकत्ता हाई कोर्ट भी बने,को नियुक्त किया गया। इन मेम्बर्स के द्वारा गहन समीक्षा के बाद इंडियन लेजिस्लेटिव कौन्सिल मे प्रथम बार दि०28 दिसम्बर 1856 को और दूसरी बार दि० 3 जनवरी 1857 को प्रस्तुत कर पढ़ा गया। सभी समीक्षाओं मे यह कहा गया कि लार्ड मैकाले ने जो ड्राफ्ट
अपने देखरेख मे तैयार किया था उसे ही भारतीय दन्ड संहिता का मूल आधार बनाया जाना चाहिए। इसके बाद इसे सेलेक्ट कमीटी को सौंपा गया । वहां से अनुमोदित होने के बाद पूरे बिल को 21, 24,एवं 28 जनवरी 1857 को कलकत्ता गज़ट मे प्रकाशित किया गया और अंततः लगभग साढ़े तीन साल बाद 6 अक्टूबर 1860 को एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए गवर्नर जनरल के द्वारा इसे हस्ताक्षरित कर दिया गया। पहले इसे 1 मई 1860 को लागू होना था किन्तु जनमानस एवं विधिवेत्ताओं को इसे समझने के लिए पर्याप्त समय मिल सके इसलिए इसे 1जनवरी 1862 से लागू किया गया । इस प्रकार भारतीय दन्ड संहिता 1860 लगभग 26 वर्षों की लम्बी यात्रा (1834 से लेकर 1860 तक) के बाद अधिनियम का रूप ले सका।
आज हम कुछ संसोधनो के साथ इसी कानून से शासित होते हैं जिसकी drafting लगभग 185 वर्षों पुरानी है, और जो हमारी न्याय व्यवस्था की आज भी रीढ़ है। हम कल्पना कर सकते हैं कि वर्ष 1834-1837 की सामाजिक,आर्थिक , प्रसाशनिक, व्यापारिक, कृषि, शिक्षा, साक्षरता, स्वास्थ, मानवाधिकार, कानून का शासन
(rule of law), मूल अधिकार, जीवन की स्वतंत्रता, अपराधों की स्थिति, दन्ड के नियम व सिध्दांत, राष्ट्रीयता, शासन करने की मंशा ओर उद्देश्य, जनतांत्रिक मूल्य आदि की दशा क्या रही होगी और आज 2020 मे क्या है। उस समय के परिवेश मे जो कुछ बना वो अब इतिहास की बात है। वर्तमान परिवेश मे बहुत सी धाराओं की प्रसांगिकता अब बदल चुकी है।
भा०द०सं० का प्रारूप इंडियन लेजिस्लेटिव कौंसिल मे जनवरी 1857 मे सौंपा गया था और गज़ट भी प्रकाशित किया गया था। 10 मई 1857 को विद्रोह या प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम प्रारम्भ हुआ जिसमे लगभग 6000 ब्रिटिशर्स मारे गये और यह 1नवम्बर 1858 तक चलता रहा। परिणाम स्वरूप भारत का शासन गवर्नमेन्ट आफ इंडिया एक्ट 1858 (2 अगस्त) के अन्तर्गत सीधे क्राउन के हाथ मे चला गया। भारत मे जगह जगह आन्दोलन प्रारभ हो चुका था। भारतीयों को नियंत्रित करने के लिये जो प्रारूप 1857 जनवरी से पेन्डिंग पड़ा था उसे आनन फानन मे आन्दोलन के दबाव मे 6 अक्टूबर 1860 को पास कर दिया गया।
आज आवश्यकता भा०द०सं० के सर्जक लार्ड थामस बेनिंगटन मैकाले को दोष देने की नही है बल्कि वर्तमान भारतीय परिवेश का एवं महत्वपूर्ण जनतांत्रिक देशों की न्याय व्यवस्था का अध्ययन कर एक नये भारतीय दन्ड संहिता को जन्म देने की है।
Ratan kumar srivastava, retd. i.p.s,.,president, women empowerment foundation, kanpur. 1953 को शपथ ली और प्रथम शपथ ग्रहण समारोह मे (first inaugural ball) “मेमी आइजनहावर” ने पिंक कलर का ,जो उनका पसंदीदा कलर था ,Nettie Rosenstein inaugural gown पहना था जो अब तक के सबसे लोकप्रिय गाउन मे से एक है जो अमेरिका के Smithsonian National Museum of History’s Collection of inaugural gowns मे सुरक्षित है।पिंक कलर के नारीकरण की दुनिया मे यह एक टर्निंग प्वाइंट था,जिसके बाद से पिंक कलर का नाम ही “मेमी पिंक” हो गया ठीक उसी तरह जिस तरह इंडिया मे बाबी फिल्म के बाद “बाबी प्रिन्ट” नाम हमेसा के लिए पड़ गया। न्यूयार्क ड्रेस इंस्टीट्यूट के द्वारा अमेरिका के 12 “बेस्ट ड्रेस्ड वूमन” मे भी मेमी को चुना गया था जिससे”मेमी लुक” एक फैशन स्टाइल और पिंक कलर कपड़ो,घरेलु सामानो, बाथरुम, किंचन ,पिंक काटन बाल्स,सैनिटरी नैपकिन्स,आदि के लिए एक नेशनल ट्रेन्ड बन गया। पौन्ड्स ने मेकअप का मिनी पिंक बाक्स निकाला। मेमी को “मदर आफ पिंक” कहा गया जिन्होंने ह्वाइट हाउस को भी पिंक कलर से ऐसे सजाया कि मिडिया ने उसे “द पिंक पैलेस” कहना शुरु कर दिया था। वर्ष 1953 इस दिशा मे एक माइलस्टोन है जब मेमी पिंक फैशन पूरे अमेरिका मे छा गया और 6 वर्षों के लम्बे विश्वयुद्ध और उत्तरवर्ती प्रतिबन्धो से महिलाओं के मुक्त होने पर उन्हें नये फैशन की एक नयी प्रेरणा मिली।
पिंक कलर को एक नया आयाम तब मिला जब 1954 मे इसमे हालीवुड के ग्लेमर का बिन्दास तड़का जुड़ गया और उसने अपने सौन्दर्य के उन्मुक्त प्रदर्शन से नारी फैशन वर्ल्ड को पिंकमय कर दिया। जेन मन्सफिल्ड अमेरिकन फिल्म-थियेटर-टीवी एक्ट्रेस,नाइट क्लब डांसर,सिंगर,प्लेब्वाय मैगजीन मे पोज देने वाली हालीवुड की एक उन्मुक्त सौन्दर्य प्रतिमा थी जो 1954 से 1960 तक छायी रही जिसने नारी मर्यादा की परिधि को तोड़ते हुए भी गोल्डेन ग्लोब एवं थियेटर वर्ल्ड एवार्ड जीता। वह दौर मर्लिन मुनरो का था जिसके सौन्दर्य साम्राज्य के आभा मन्डल को वेधना सम्भव नहीं था। उस समय के सभी मशहूर चैनल किसी न किसी अभिनेत्री को प्रोजेक्ट करते थे इसी क्रम मे “20th सेन्चुरी फाक्स ” ने मन्सफील्ड को मर्लिन मुनरो के विकल्प के रुप मे प्रस्तुत कर उसके अंगप्रत्यंगों के सोन्दर्य का ऐसा तुलनात्मक चित्रण एवं प्रदर्शन प्रस्तुत किया कि वह जल्दी ही “world’s most-photographed hollywood celibrity” बन गयी। उस समय अभिनेत्रियों का सिगनेचर कलर होता था जिनसे उनकी पहचान बनती थी। मन्सफिल्ड का सिगनेचर कलर पिंक था,उसनें कैलीफोर्निया के बेवरले हिल्स मे 40 कमरे का एक भव्य बंगला खरीदा था। पूरे बंगले को पिंक रंग मे रंगवाया था,पिंक रंग की फ्लोरेसेंट लाइट लगवाया था,बाथरूम मे भी पिंक फर लगे थे, हृदय के आकार का बाथटब था वह भी पिंक रंग मे ही था,एक फाउन्टेन था जिससे पिंक शेम्पेन के फुहार निकलती थी,यहाँ तक कि एक हृदय के आकर का पिंक स्वीमिंग पूल भी था ,इस बंगले को मिडिया ने “पिंक पैलेस” का नाम दिया जो अमेरिका मे पिंक फैशन आइकन बन गया।यही नही,मन्सफील्ड ने “कैडिलैक एल्डोराडो बियारिज विथ कन्वर्टिबल टेलफिन्स” लक्जरी कार भी रखा था और वह भी पिंक कलर मे ही था जो उस समय हालीवुड मे अकेली पिंक कार थी। पहली बार हालीवुड मे किसी की लाइफ स्टाईल एक ब्रैन्ड मे तबदील हो गई।मन्सफील्ड का पिंक प्रेम और फैसन कहीं न कहीं मेमी आइजनहावर के “मेमी पिंक ” “फर्स्ट लेडी पिंक ” से प्रेरित था जिसका प्रयोग एक सीढ़ी की तरह उन्होंने अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए किया क्योंकि मेमी आइजनहावर का प्रथम inaugural ball (dance with social elite gathering) 1953 मे हुआ था जो 1961 तक फर्स्ट लेडी बनी रहीं और वो एक नेशनल फिगर थीं जबकि मन्सफील्ड की 1954 मे टीवी मे शुरुआत हुई और 1955 मे बड़े स्क्रीन पर आईं किन्तु उनका भी पिंक रंग के नारीकरण मे धमाकेदार योगदान था। पिंक फैशन अब ऐसा नेशनल ट्रेन्ड बन गया था कि बड़ी बड़ी हस्तियां इसमे रंग गयी थीं। फर्स्ट लेडी जैक्लीन केनेडी भी जो अमेरिका के राष्ट्रपति जा़न एफ.केनेडी की पत्नी थीं वो भी एक फैसन आइकन थीं और उन्हें भी पिंक पसंद था। जब 22 नवम्बर 1963 को राष्ट्रपति जा़न एफ. केनेडी की हत्या हुई उस वक्त फर्स्ट लेडी ने “पिंक चैनेल सूट” ही पहना था। SELF MAGAZINE, के एडीटर इन चीफ,एलेक्जेंड्रा पेन्नी ने नेशनल ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस स्पेशल मन्थ ईशू निकालने के वक्त 1992 मे ब्रेस्ट कैंसर के लिये भी “पिंक रिबन” ही चुना।
वर्तमान समय वैश्विक बाजार का है, मल्टीनेशनल,नेशनल,लोकल कम्पनियां हर ऐसे बाजार को लक्ष्य बनाती हैं जहाँ उन्हें पूंजी निवेश का कई गुना लाभ मिल सके और इसके लिए मार्केट ट्रेन्ड का शोध कर उन उत्पादों को बढ़ातीं है। फैशन आइकन,मिडिया,मार्केट ओर कम्पनियां मिल कर फैशन के अस्तित्व और पहचान की निरन्तरता बनाती हैं। आज भी इसी कारण मैडम पम्पाडोर,डी हटिंगटन,मैमी आइजनहावर,जेन मन्सफील्ड और जैकलीन केनेडी से लेकर आज तक पिंक रंग की पहचान एक नारी रंग के रुप मे बनी हुई है।

सौजन्य से- रतन कुमार श्रीवास्तव रिटायर्ड आईपीएस, प्रेसिडेंट- वोमेन एम्पावरमेंट फाउंडेशन थ्रू लीगल अवेयरनेस, कानपुर

संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.

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