पिता का दर्द देख आँसुओं से भीगी बेटी ने फिर उसी से जुटा ली जीने की ताकत

घर पर जब विपत्ति ने झपट्टा मारा तो माँ के लिए ‘माँ’ बन गई अनुष्का

पढ़ाई से लेकर खेल मैदान तक हमेशा सबसे आगे रही पापा की लाडली

राजनीति में तो कोई रुचि नहीं पर इंदिरा गाँधी को सबसे बोल्ड लीडर माना

डॉ. राकेश द्विवेदी
उरई: एक बेटी कितनी बहादुर निकली ! उसे आँसुओं ने बार – बार हराना चाहा पर हर बार आँसुओं को ही सूखी हुई अवस्था में वापस लौटना पड़ा। ऐसा नहीं कि अनुष्का आँसुओं से भीगी नहीं थी ! वह रोई भी और भीगी भी पर बाद में इसी से ऊर्जा पाकर वह चट्टान की तरह खड़ी रही।
एक बेटी जब हताश माँ के लिए खुद ‘माँ’ बनकर आँसू पोछ दे तो कहा जा सकता है कि इस बेटी में कुछ खास है! अनुष्का यादव बचपन से बहुत समझदार रही। पढ़ने में तो उसका कोई मुकाबला नहीं था। हमेशा क्लास में टॉप ही रही। शुरुआत वीएसबी एजूकेशन सेंटर से हुई। पढ़ाई को लेकर घर पर तारीफ ही पहुँची। महर्षि विद्या मंदिर में उसने एथलेटिक्स में भी अपनी काबिलियत सिद्ध कर दी। जिस पिता की गोद में अनुष्का उछली- कूदी वह बेटी इतना तेज दौड़ भी लेती है ,यह तब पता चला ,जब वह घर इनाम ले आई। इंटर की परीक्षा में उसने पीसीएम में 90 प्रतिशत अंक लाकर अपना लक्ष्य निश्चित कर लिया। आईआईटी में सिलेक्ट होने की तैयारी भी शुरू कर दी थी, तभी परिवार को परेशानी में डालने वाला एक ऐसा ‘तूफान घर आ पहुँचा जिसने इंजी. बीएस यादव के सपनों को तोड़ने की कोशिश की। वह एक गंभीर बीमारी से ग्रस्त पाए गए । इसकी जानकारी होते ही घर का कोना- कोना उदास हो गया। बेटा अभी छोटा था और बेटी भी अभी इतनी बड़ी नहीं थी कि इतने बड़े संकट का सामना कर पाती। अभी तो उसने इंटर की ही परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इतनी बड़ी बीमारी का नाम सुनकर पत्नी सरिता विचलित हो गईं। अब अनुष्का के सामने दोहरी चुनौती थी। पिता के इलाज के साथ माँ को तसल्ली देकर खुद के भविष्य को सँवारना। आईआईटी का ख्वाब पूरा न होते देख वह बी.टेक की ओर मुड़ गई। इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन को चुना। बीमारी के कारण पिता उसका एडमिशन भी कराने न जा पाए। वह खुद ही दौड़ती- भागती रही। कॉलेज से लेकर हॉस्टल तक उसने यह कभी साबित नहीं होने दिया कि वह किस कदर कठिनाइयों के दौर से गुजर रही है। तीन सेमेस्टरों में आये नंबरों से कोई समझ भी नहीं सकता पर हॉस्टल की उन सीढ़ियों को ही यह पता है कि अनुष्का के हृदय में कितना दर्द है ! रात के अंधेरे में वह इन्हीं सीढ़ियों के पास बैठकर खुद से बातें कर आँसुओं में भीगती रहती थी। उसे डर सताने लगा कि कहीं वह उस गोद से वंचित तो नहीं हो जाएगी, जिस पर खेलकर वह इतनी बड़ी हुई ? पिता की बीमारी से उसकी एकाग्रता भी चुटहिल होती फिर वही सभली रही। जब आँखें भी रोने से इन्कार कर देती तो वह अगली सुबह फिर से बहादुरी के साथ जीने की इच्छा लेकर सोने चली जाती। वर्षों से ऐसा चलता आया। उत्साह – उम्मीद और आँसुओं के बीच द्वंद्वों के साथ अनुष्का अपनी मंजिल की ओर बढ़ती गई। अब तो वह करीब इंजीनियर बनने की ओर है।
अनुष्का की समझदारी देखिए ! जब उरई आती तो वह अपनी पीड़ा को हॉस्टल छोड़ आती ! पिता के साथ उसी मुस्की और खिलखिलाहट के साथ उनके गले लग जाती और बीमारी से लड़ने का साहस पैदा करती। दवाइयों को खिलाने की जिम्मेदारी खुद संभाल लेती। जब भी माँ की आँखों में आँसू देखती तो उन्हें पोछकर समझाने लगती है कि किसी भी चुनौती का सामना धैर्य रखकर ही किया जा सकता है। जब हॉस्टल जाने का वक्त होता है तब समझाती है- ‘माँ प्रगति के लिए त्याग करना होता है’
अनुष्का की एक गुण यह भी है कि वह 100 और 200 मीटर की बहुत अच्छी धाविका है। इसमें वह अब तक प्रथम और द्वितीय रहने के तमाम मैडल जीत चुकी है। एटलेटिक्स टीम की वह कप्तान भी है। इस छात्रा को राजनीति में कोई इंट्रेस्ट नहीं। हाँ , इंदिरा गाँधी से जरूर प्रभावित है। कहा कि उनके बारे जितना पढ़ा इस आधार पर कह सकती हूँ कि इंदिरा गाँधी बहुत ही बहादुर महिला थीं । हमेशा सख्त कदम उठाती थीं। समाज के कमजोर पड़ते संस्कारों पर भी उसने चिंता जताई। एफ कैट की पढ़ाई भी अनुष्का करना चाहती है। उसकी यह बहुत चाहत है कि वह पायलट बनकर आकाश में हवा से बातें करे।
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