प्रवासी मजदूरों के वापिस घर लौट आने से महीनों तक नहीं चलेंगी फैक्टरियां, नहीं निकलेगा चिमनियों से धुआं

प्रवासी मजदूर लॉक डाउन 2-3 के दौरान रोड पर पैदल चलते हुए

फैक्टरियों के ठेकेदार प्रलोभन देकर मजदूरों को लेने आ सकते हैं उनके गांव
69 दिनों में लौटे हैं लगभग 90 लाख मजदूर
अनिल शर्मा+संजय श्रीवास्तव+अशोक त्रिपाठी जीतू
झाँसी/उरई: कोरोना वायरस महामारी के चलते हुए देश व्यापी लॉक डाउन के कारण हालात के मारे मजदूर अपने अपने घरों को लौट आए हैं। लॉक डाउन में 69 दिनों में देश भर से लगभग 90 लाख से अधिक मजदूर अपने घरों को लौटे हैं। इन्होंने सैकड़ों मील पैदल, तपती धूप में हाइवे पे भूखे प्यासे अपने परिजनों के साथ सफर किया है।
अब लौटने के बाद ज़्यादातर मजदूर कम से कम 6 माह तक वापिस फिर से अपने काम मे महानगरों को नही लौटना चाहते। इसके कारण महानगरों में फैक्टरियां नहीं चलेंगी, चिमनियों से धुआं नहीं उठेगा। लेकिन ऐसी स्थिति में हो सकता है कि फैक्टरियों में मजदूरों के ठेकेदार तथा ठेके पर अन्य मजदूरी के लिए ले जाने के लिए कई ठेकेदार गांव ने आएं और प्रलोभन देकर मजदूरों को ले जाएं। लेकिन फिलहाल महानगरों में 1-2 महीने प्रवासी मजदूरों के जाने की स्थिति नही दिखाई दे रही है।
मालूम हो कि देश के चार प्रमुख महानगरों में से मुंबई में कुल 1,67,000 कंपनियां पंजीकृत हैं। जिनमे लगभग 2 लाख से अधिक प्रवासी मजदूर काम करते हैं। इसके अलावा बिल्डरों के यहां, तबेलों मे, पानी पूरी का काम करने वाले, हम्माली, सब्जी बेचने वाले तथा मोहल्लों में फेरी लगाने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या लगभग 1,25,000 है। मुंबई से इन 3,25,000 मजदूरों में से लगभग 80 प्रतिशत मजदूर वापिस अपने घरों को लौट आए हैं। इसी तरह एनसीआर(दिल्ली,नोएडा-ग़ाज़ियाबाद यूपी, गुड़गाव-फरीदाबाद हरयाणा) में कुल 1,83,000 कंपनियां रजिस्टर्ड हैं। इनके अलावा पानी पूरी वाले, फेरी वाले, दूध वाले, हम्माली,सब्जी का काम करने वाले, बिल्डरों के यहां काम करने वाले आदि प्रवासी मजदूरों की संख्या लगभग 4,12,000 है। इनमे से लगभग 80 प्रतिशत मजदूर अपने घरों को लौट आए हैं। इसी तरह कोलकाता महानगर में 10,000 कम्पनियां रजिस्टर्ड हैं। यहां पे 96,000 प्रवासी मजदूर फैक्टरियों तथा अन्य कंपनियों में कार्यरत हैं। इसके अलावा बिल्डरों के यहां काम करने मजदूर, दूध का काम करने वाले, सब्जी बेचने वाले, हम्माली का काम करने वाले तथा पानी पुरी बेचने वाले मजदूरों की संख्या लगभग 75,000 है। इनमे से 75 प्रतिशत अपने घर वापिस आ गए हैं। इसी तरह तमिलनाडु प्रदेश की राजधानी चेन्नई में 40,243 कंपनियां रजिस्टर्ड हैं। जब्की बिल्डरों के यहां काम करने वाले, हम्माली का काम करने वाले, दूध बेचने वाले, सब्जी बेचने वाले, पानी पूरी बेचने वाले आदि मजदूरों की संख्या लगभग 78,000 है। जबकि फैक्टरियों, कंपनियों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या लगभग 2,26,000 है। इन सभी प्रावसी मजदूरों में से 75 प्रतिशत मजदूर अपने घरों को लौट आए हैं। इसी तरह कर्नाटक की राजधानी बंगलोर तथा अन्य नगरों, तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद तथा अन्य नगरों, आंध्र प्रदेश के कई नगरों, गुजरात प्रदेश से सूरत अहमदाबाद पालनपुर वडोदरा सहित कई नगरों, पंजाब और हरयाणा की राजधानी चंडीगढ़, अमृतसर, लुधियाना, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून तथा कई अन्य नगरों, हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और अन्य नगरों सहित देश के तमाम महानगरों व शहरों से ये प्रवासी मजदूर अपने अपने राज्यों से पलायन करके फैक्टरी, मिलों, कंपनियों में मासिक वेतन पर काम करने वाले तथा दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने वाले ये करोडों मजदूर रोजी रोटी की तलाश मे अपने गांव, अपने प्रदेश से पलायन करके प्रतिवर्ष यहाँ पहुँचते हैं। और होली, दीवाली, ईद, मोहर्रम में कुछ दिनों के लिए अपने गांव, घर लौट आते थे। लेकिन इस वर्ष कोरोना वायरस के विश्व व्यापी प्रकोप के चलते केंद्र सरकार द्वारा किये गए लॉक डाउन के कारण पिछले 69 दीनो में बड़ी संख्या में ये प्रवासी मजदूर अपने परिजनों के साथ अपने-अपने प्रदेशों और अपने अपने गांव घरों को लौट गए हैं।
द यंग भारत की टीम झाँसी में शिवपुरी से झाँसी आने वाले हाइवे पर तथा झाँसी से कानपुर जाने वाले हाइवे पर पिछले 2 माह तक मजदूरों की समस्याओं पर रिपोर्टिंग करता रहा है। इस दौरान हजारो प्रवासी मजदूरों और उनके परिजनों से टीम की बात हुई है। इस दौरान बलरामपुर और गोंडा जा रहे मजदूर राम सिया यादव, प्रेमप्रकाश बरार, सुनील राय, असलम उनकी पत्नी रिहाना, तो वहीं गोरखपुर जा रहे मजदूर मोहम्मद इस्लाम, सईद, सलीम, प्रेमनारायण, रामनरेश, कंधई, मुन्नी देवी, सीता देवी, राधा, कमलेश कुमारी, चंद्र मुखी, नथुनिया, या फिर चाहे कानपुर, लखनऊ, औरैय्या, इटावा, मैनपुरी, बाराबंकी, प्रतापगढ़, बहराईच, झाँसी, चित्रकूट, बाँदा, हमीरपुर, महोबा, ललितपुर, या फिर छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, दतिया, दमोह, सागर सहित उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश के तमाम जनपदों के हजारों प्रवासी मजदूरों से हुई बातचीत में एक दर्द हर मजदूर और उनके परिजनों के मुह से निकला कि लॉक डाउन में हमारी फैक्टरी, कंपनी, बिल्डर आदि के काम बंद हो गए थे। यहां तक कि सेठ ने हम्माली तक का काम बंद कर दिया था। हमारा वेतन और दिहाड़ी बन्द हो गई थी। दुकानदारों ने उधार देना बन्द कर दिया था। मकानमालिक ने कोरोना के कारण कमरा जल्द से जल्द खाली करने को कहा। बड़ी बुरी हालत मे हमे घर वापिस लौटने का निर्णय लेना पड़ा।
लॉक डाउन के दौरान हाइवे में कई जगह पैदल चलते समय हमने और हमारे परिजनों ने पुलिस की गालियां खाईं। कई जगह पुलिस के डंडे भी खाए। उत्तरप्रदेश की पुलिस ने मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बॉर्डर में हमे 5-5 घंटे तक बैठाय रखा। ट्रक वालों ने मन माना पैसा लूटा। पैदल चलते समय कही थोड़ा बहुत खाने को मिला, भूखे रहे लेकिन चलते रहे। ज्यादातर मजदूरों ने कहा कि अब तो 6 माह तक हम वापिस महानगर नहीं जाएंगे। बुंदेलखंड की तमाम महिला मजदूरों ने तो द यंग भारत की टीम के सामने अपने कान पकड़कर कहा था कि “रामधई अब कबहूँ मजदूरी खां परदेश नहीं जैहें”। अगर मजदूर अपनी बात पे अटल रहत तो जल्दी महानगरों की उद्योगों की चिमनियों से न जल्दी धुंआ निकलना शुरू होगा और न ही फैक्टरियों में मशीनों की खटखट सुनाई देगी। हो सकता है फैक्टरियों और कंपनियों के ठेकेदार मजदूरों को प्रलोभन देकर इनके गांव लेने आएं।
संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.
सुझाव एवम शिकायत- प्रधानसम्पादक 9415055318(W), 8887963126