फिर चालू हुआ श्रमिकों का पलायन, खाली होने लगे गांव

मजदूरों के पलायन से मायूस हुए पंचायत प्रत्याशी
पंचायत प्रत्याशियों ने खूब खातिरदारी की
उनके खेत जुतवाए, भूसा दिया और बिना ब्याज का कर्ज भी दिया
गांव में मनरेगा के अलावा मजदूरी का कोई अन्य इंतजाम न होने पर मजदूर महानगरों को लौटने लगे

अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

बुंदेलखण्ड। कोरोना महामारी के कारण लाकडाउन में जिस तरह से महानगरों से प्रवासी मजदूर अपने अपने गांव को लौटकर आए, रास्ते में उन्होंने अपने परिवार और मित्र मजदूरों के साथ महानगरों से जिस तरह सैकड़ों मील पैदल चलकर रास्ते में चिलचिलाती धूप, भूख, प्यास सब कुछ बर्दाष्त करते हुए तरह तरह की तकलीफें उठाते हुए अपने अपने गांव पहुंचे थे। तब ज्यादातर प्रवासी मजदूर यह कह रहे थे कि वे वापस महानगर नहीं जाएंगें। इससे गांव वाले यह मान रहे थे कि अब मजदूर जल्दी महानगर की ओर पलायन नहीं करेंगे। लेकिन सिर्फ 5 महिनों में ही इन मजदूरों के सामने रोजी रोटी और भविष्य की चिंताएं सताने लगीं। जिससे कोरोना की बढ़ती बीमारी के बीच उन्हें महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
वैसे तो पंचायत प्रत्याषियों ने मजदूरों के लिए काफी प्रयास किए लेकिन मनरेगा के अलावा मजदूरी की कोई अन्य ठोस व्यवस्था न होने से इन प्रवासी मजदूरों ने जो पहले साहूकारों से कर्ज ले रखा था। उसकी वापसी बच्चों की पढ़ाई लिखाई और ढंग से भोजन की व्यवस्था उन्हें सताने लगी। इसलिए वे महानगरों में एक बार फिरसे जाने की सोचने लगे।
राष्ट्रीय जलजन जोड़ो अभियान के संयोजक डा0 संजय सिंह कहते हैं कि सरकार और मीडिया के आंकड़ों के अनुसार उप्र और मप्र के बुंदेलखण्ड में लगभग नौ लाख मजदूर लाकडाउन के दौरान अपने गांव वापस लौटे हैं। मजदूरों ने बताया कि जब वे गांव लौटे थे तब फसल की कटाई लगभग हो चुकी थी। उनके सामने रोजगार की समस्या थी और रोजगार के रूप में सिर्फ मनरेगा थी। जिसमें एक जाब कार्ड धारक मजदूर को साल में सौ दिन काम देने की गारण्टी है। लेकिन इसमें महानगरों से लौटे सभी प्रवासी मजदूरों केा काम नहीं मिल पा रहा है।
जालौन के कुठौंद ब्लाक की कुरेपुरा कनार पंचायत की प्रधान सुनीता गुप्ता बताती हैं कि प्रवासी मजदूरों को उनकी जरूरतों के हिसाब से मनरेगा में काम देने में कई तकनीकी बाधाएं हैं। जैसे ई मस्टर रोल में जब किसी मजदूर परिवार के 85 दिन से अधिक काम हो जाता है तो मनरेगा की इंट्री होना बंद हो जाती है। मनरेगा में यदि एक ही परिवार के दो भाई हैं और एक ही चूल्हे में खाना बनता है तो एक ही जाब कार्ड होगा। यदि भाई 26 साल का है और अपने भाई के ही जाब कार्ड में शामिल है। जिसके कारण उसे 100 की जगह 50 दिन काम ही मिल पाता है। चूंकि लिंगानुपात में कमी के कारण भाई की शादी नहीं हुई वरना उसका अलग घर, अलग चूल्हा होता तो उसके परिवार को भी 100 दिन का रोजगार मिलता, जो नहीं मिल पा रहा है।
वहीं ग्राम रानीपुर के नत्थू सिंह बताते हैं कि जब तक पंचायत चुनाव नहीं टले थे। तब तक पंचायत प्रत्याषी प्रवासी मजदूरों को बिना ब्याज का ऋण, खेतों की फ्री जुताई, अनाज और भूसा फ्री दे रहे थे। ताकि प्रवासी मजदूर पंचायत चुनाव तक गांव में ही रहें। लेकिन जैसे ही कोरोना महामारी और बढ़ी जिसके चलते प्रदेष शासन ने पंचायत चुनाव फिलहाल टाल दिए हैं तो भावी प्रत्याषियों ने अपने हाथ तेजी से सिकोड़ लिए। जिसके कारण प्रवासी मजदूरों के सामने एक बार फिरसे रोजी रोटी के लिए महानगरों के लिए जाना मजबूरी बन गया है। सामाजिक कार्यकर्ता श्री कृष्ण का कहना है कि रक्षाबंधन का पर्व तो बीत गया है। अब जन्माष्टमी के पर्व के बाद मजदूरों का पलायन और तेज हो जाएगा।

संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.

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