बसपा वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में दलित, मुस्लिम, पिछड़ा और ब्राह्मण का कार्ड खेलेगी

वर्ष 2007 में बसपा के 206 विधायक जीते
दलित, मुस्लिम,पिछड़ा व ब्राह्मणों के समर्थन से मिली थी भारी जीत
बसपा सुप्राीमों मायाबती इसी फार्मूले से 2022 में पांचवीं बार उप्र की मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं
अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

लखनऊ। बसपा सुप्रीमों सुश्री मायावती ने वर्ष 2022 के चुनाव में पांचवी बार उप्र की मुख्यमंत्री बनने के लिए अभी से रणनीति बनानी शुरू कर दी है। वर्ष 2007 में जिस तरह से बसपा को प्रदेश में दलित, पिछड़े और अति पिछड़े, ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाताओं के बल पर कुल 403 विधानसभा सीटों में से 206 सीटों पर अकेले बम्पर जीत मिली थी। उसी को आधार बनाकर एक बार फिर से बसपा सुप्रीमो मायावती 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती हैं। वे एक बार फिर से बसपा का स्पष्ट बहुमत लाकर पांचवीं बार उप्र की मुख्यमंत्री बनना चाह रही हैं।
प्रदेश में मतदाताओं को यदि जातीय आंकड़ों से देखा जाय तो पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या लगभग 50 प्रतिषत, दलित मतदाताओं की संख्या लगभग 20 प्रतिषत, मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 15 प्रतिषत तथा ब्राह्मण मतदाओं की संख्या लगभग 11 प्रतिषत है।
2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 97 ब्राह्मण नेताओं को टिकिट दिया था, जिनमें से 65 चुनाव जीते थे। इसी तरह से पिछड़े वर्ग में 130 प्रत्याषियों को टिकिट दिया था, जिसमें से 85 प्रत्याषी चुनाव जीते थे। इसी तरह मुस्लिम वर्ग में 21 प्रत्याषियों ने चुनाव जीता था। जबकि दलितों में 35 प्रत्याषी चुनाव जीते थे।
इसी फार्मूले को ध्यान में रखते हुए बसपा सुप्रीमेा ने अभी से जो चुनावी रणनीति बनानी शुरू की है। इसके चलते मुस्लिम समाज के नेता मुनाकद अली को जहां बसपा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में नगीना क्षेत्र से बसपा सांसद को बसपा संसदीय दल का नेता बनाया है। इसी तरह अमरोहा से बसपा सांसद कुंवर दानिष अली को लोकसभा में बसपा का मुख्य सचेतक बनाया है। इसी तरह जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए सांसद श्याम सिंह यादव को बसपा का लोकसभा का सचेतक बनाया है। जबकि बसपा के राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा सांसद तथा बसपा में ब्राह्मण नेता के रूप में पहचान रखने वाले सतीष मिश्रा को राज्यसभा में बसपा के सदन का नेता बनाया है। इससे साफ है कि बसपा सुप्रीमो उप्र में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में दलित, मुस्लिम, ब्राह्मण और पिछड़े का कार्ड चलाकर एकबार फिर से प्रदेश की गद्दी में काबिज होना चाहती हैं।