बिहार विधानसभा चुनाव का जातीय गणित वर्तमान समय में महागठबंधन के पक्ष में

यादव 13, मुस्लिम हैं 10 प्रतिशत, दलित हैं सबसे अधिक 16 प्रतिशत

सवर्णों में सबसे ज्यादा वैष्य 10 प्रतिशत, ब्राह्मण 6 प्रतिशत, ठाकुर साढ़े 5 प्रतिशत, कायस्थ ढाई प्रतिशत

कुर्मी 3 प्रतिशत, कुषवाहा 3 प्रतिशत, अति पिछड़ा 7 प्रतिशत, महादलित 5 प्रतिशत

हम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने महागठबंधन से बगावत कर दी है

अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

पटना। आगामी माह नवंबर 2020 में यदि चुनाव आयोग विहार विधानसभा के चुनाव करवा देता है तो आज की स्थिति में जातीय आंकड़े महागठबंधन के पक्ष में जाते नजर आ रहे हैं। यह बात दूसरी है कि अभी महागठबंधन बनाने में लगे सभी दल और बामपंथी दलों के साथ साथ सत्तारूढ़ दल राजग का एक सहयोगी दल लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान खुलकर बिहार में कोरोना महामारी व बाढ़ संकट को देखते हुए चुनाव की तिथि बढ़ाने की पुरजोर मांग चुनाव आयोग से कर रहे हैं।
अगर बिहार में विधानसभा चुनाव होने तक महागठबंधन ठीक से बन जाए तो वर्तमान में जातीय गणित महागठबंधन के पक्ष में जाता नजर आ रहा है। लेकिन यदि महागठबंधन नहीं बन पाया उसमें सीटों की बंटवारे को लेकर फूट पड़ी और कुछ पार्टियों ने अलग अलग चुनाव लड़ा या सीटों के सवाल पर महागठबंधन से टूटकर कुछ दल राजग में शामिल हो गए तो फिर महागठबंधन का जातीय समीकरण गड़बड़ा जाएगा।
मालूम हो कि बिहार विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7 करोड़ 10 लाख है। जहां तक लिंगानुपात की बात है, पूरे बिहार के जिला भोजपुर की दो सीटों में जहां सबसे कम लिंगानुपात है। यहां भोजपुर की बड़हरा विधानसभा सीट में 1000 पुरुषों के मुकाबले 793 महिलाएं हैं। इसी जिले की शाहपुर सीट में 1000 पुरुषों पर 786 महिलाएं हैं। जबकि बाकी 241 विधानसभा सीटों में 1000 के मुकाबले 900 महिलाएं हैं।
बिहार में कुल 243 विधानसभा सीटें हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में जनता दल यू ने महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ा था और भारी जीत हासिल की थी। इस चुनाव में महागठबंधन के राष्ट्रीय जनता दल को 80 सीटें, जनता दल यू को 71 सीटें, कांग्रेस को 27 सीटें, भाजपा को 53 सीटें मिली थीं और महागठबंधन ने भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई थी और नितीश कुमार मुख्यमंत्री बने थे। जब कि विरोधी दल में भाजपा को 53, लोजपा को 2, लोसपा को 2 और एक सीट हम को, 13 सीटें सीपीआइ सीपीएम तथा निर्दलीय मिलाकर अन्य दलों को मिली थीं।
लेकिन दो वर्ष के भीतर राजग के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी यादव और नितीश कुमार के बीच मतभेद पैदा हो गया और नितीश कुमार ने राजग के साथ मिलकर सरकार बना ली। पिछले 15 सालों से नितीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। इसके चलते मुख्यमंत्री और सरकार का लेकर एंटीइंकबेंसी भी है। भाजपा और लोजपा के साथ बनाई गई सरकार में नितीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुषील मोदी उपमुख्यमंत्री बने। यदि माह नवंबर 2020 में ही चुनाव होते हैं तो मतदाताओं जातीय संख्या को यदि देखें, तो दलितों की संख्या 16 प्रतिशत है। इन दलितों में सबसे ज्यादा संख्या पासवान बिरादरी के मतदाताओं की है। इसके बाद रविदास, मल्लाह, मुसहर आदि दलित बिरादरी के लोग हैं।
ओबीसी में सबसे ज्यादा 13 प्रतिशत मतदाता यादवों के हैं और लगभग 10 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम के हैं। इसके अलावा कुर्मी तथा कुषवाहा बिरादरी के 3-3 प्रतिषत मतदाता हैं। जबकि अन्य पिछड़ी जातियों के 7 प्रतिषत मतदाता हैं। इसी तरह सवर्ण जातियों में ब्राह्मणों के 6 प्रतिषत, ठाकुरों के साढ़े पांच प्रतिषत, वैष्यों के 10 तथा कायस्थ बिरादरी के 2 प्रतिषत मतदाता हैं। यदि यादव, मुस्लिम, कुषवाहा दलितों में रविदास, मल्लाह, मुसहर अति पिछड़ी जातियां महागठबंधन का वोट देते हैं। तो इन्हें मिलाकर चालीस से पैंतालीस प्रतिषत तक वोट हो जाता है। यदि एंटीइंकंबैसी वोट को जोड़ दिया जाए तो यह प्रतिषत 48 तक जा सकता है।
इस तरह से आज की स्थिति में यदि महागठबंधन मजबूती से बन जाता है तो जीत उसी की होती नजर आ रही है। उधर दूसरी तरफ जनता दल यू, भाजपा और लोजपा के गठबंधन को यदि जातीय समीकरण में हिसाब से देखा जाय तो ब्राह्मण 6 प्रतिषत, ठाकुर साढ़े प्रतिषत, दलितों में पासवान 10 प्रतिषत, वैष्य दस प्रतिषत, महादलित 3 प्रतिषत, कायस्थ ढाई प्रतिषत, कुर्मी 3 प्रतिषत, अति पिछड़े 7 प्रतिषत इन्हें मिलाकर यह संख्या 40 से 42 प्रतिषत तक होती है जो महागठबंधन के मुकाबले कम हैं। लेकिन आज महागठबंधन बनने से पहले ही लोकतांत्रिक आवामी पार्टी हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने जिस तरह से महागठबंधन से नाता तोड़ने की घोषणा की है और उनके राजग में सम्मिलित होने की संभावनाएं बढ़ गईं हैं।
इसी तरह से यदि महागठबंधन के अन्य दलों में सीटों के बंटवारे को लेकर महागठबंधन से नाता तोड़ा, तो फिर महागठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी। जिस चुनाव में बसपा भी पूरे दमखम के साथ चुनाव लड़ना चाहती है। इससे दलितों के वोटों में बंटवारा हो सकता हैं। इसी तरह से महागठबंधन के मुस्लिम वोटों पर सेंध लगाने लिए ओबेसी की पार्टी एआइएमएम ताल ठोंक रही है। यदि समाजवादी पार्टी ने बिहार में चुनाव लड़ा तो निष्चित ही महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ेगी। कुल मिलाकर बिहार की वर्तमान स्थिति में महागठबंधन की ओर ज्यादा वोट जाते दिखाई दे रहे हैं।

संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.

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