बिहार विधानसभा चुनाव में संयुक्त महागठबंधन यदि बन गया तो नितीश को मिलेगी कड़ी चुनौती

बिहार विधानसभा में कुल सीटें हैं 243

सत्तारूढ़ दल राजग की स्थिति- जनतादल (यू) 71, भाजपा 53 और लोजपा 2 कुल 126

महागठबंधन की सीटें- राष्ट्रीय जनता दल 80, कांग्रेस 27, लोसपा 2, हम 1 कुल 110,सीपीआइ, सीपीएम और अन्य 7

अनिल शर्मा़+संजय श्रीवास्तव़+डा0 राकेश द्विवेदी

पटना। पिछले तीन विधानसभा चुनाव से मुख्यमंत्री बनते आ रहे नितीश कुमार के सामने जहां एक ओर एंटीइनकंबेंसी का असर भी मतदाताओं में दिखाई देगा, तो वहीं इस बार राजग को बिहार विधानसभा की सत्ता से उखाड़ फेकने के लिए संयुक्त महागठबंधन भी सामने आ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो नितीश को सत्ता बचाने के लिए लोहे के चने चबाने होंगे।
सत्तारूढ़ दल राजग के मुख्यमंत्री नितीश की पार्टी जनता दल (यू) के विधानसभा में 71 विधायक हैं। भाजपा के 53 तथा सहयोगी दल लोजपा के 2 विधायक हैं। कुल मिलाकर 126 विधायकों के बल पर राजग के मुख्यमंत्री नितीश सत्ता में हैं। जबकि संयुक्त महागठबंधन यदि ठीक तरीके से बन जाता है तो उसमें राष्ट्रीय जनता दल के 80, कांग्रेस के 27 और राजग छोड़कर आई लोक समता पार्टी के नेता उपेन्द्र कुषवाहा के 2 और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा का एक विधायक है जिसके नेता पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी हैं। वे भी अब राजग छोड़कर महागठबंधन के साथ आ गए हैं। इसके अलावा सीपीआइ, सीपीएम, माले तथा असदुद्दीन आवैसी की पार्टी एआइएमआइएम ये सब मिला दिया जाय तो बिहार के मतदाताओं में यादव, मुस्लिम, अति पिछड़े और महादलित केा मिलाकर एक ऐसी ताकत बन जाते हैं जो आसानी से सत्तारूढ़ दल राजग को आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता से बाहर रखने की क्षमता रखते हैं।
संयुक्त महागठबंधन को इस बार राष्ट्रीय जनतादल के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का मार्गदर्षन और उनकी कुषल कूटनीतिक रणनीति का सहारा मिल सकता है। क्योंकि लालू प्रसाद यादव इस चुनाव में पेरौल पर रहने वाले हैं। लालू प्रसाद यादव को भारतीय राजनीति का एक बहुत ही चतुर रणनीतिकार और कुषल खिलाड़ी माना जाता है। दूसरा संयुक्त महागठबंधन के पक्ष में मुख्यमंत्री नितीष कुमार का लगातार तीसरी बार के मुख्यमंत्री का कार्यकाल भी एंटीइंकबेंसी से वोटरों को प्रभावित करेगा। जिसका लाभ इसबार संयुक्त महागठबंठन उठा सकता है।
संयुक्त महागठबंधन के सामने सबसे बड़ी समस्या सीटों के बंटवारे को लेकर आएगी। इसबार राष्ट्रीय जनता दल जिसके पास वर्तमान विधानसभा में 80 सीटें हैं। जिसका राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी के नेता कम से कम 150 सीटों की मांग करेंगे तथा कम से कम 125 पर मान जाएंगे। इसके बाद महागठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पार्टी है, जिसके पास 27 विधायक है। जो 60 सीटों की मांग करेगी और लगभग 45 सीटों में मान जाएगी। इसी तरह उपेन्द्र कुषवाहा की लोक समता पार्टी जिसके 2 विधायक हैं। वह कम से कम 20 से 25 सीटों की मांग करेगी। इसी सीटों के बंटवारे को लेकर पिछली विधानसभा में उसकी राजग से लड़ाई हुई थी। फिर सत्ता में भागीदारी को लेकर लड़ाई इतनी तेज हो गई कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुषवाहा ने केन्द्र सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा देकर बिहार प्रदेष सरकार से अपनी पार्टी को अलग कर लिया था। वे सीटों के बंटवारे में नहीं मानने वाले।
इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री जीतन मांझी जिसकी पार्टी का विधानसभा में मात्र एक विधायक है, वे भी 10 से 15 सीटों की मांग करेंगे। इसके अलावा सीपीआई, सीपीएम और माले सीटों के बंटवारे को लेकर अपनी-अपनी शर्तें लगाएंगे। ज्यादा संभावना ये है कि सीपीआइ, सीपीएम व माले संयुक्त रूप से बाम मोर्चा बनाकर अलग से चुनाव लड़ें और यदि संयुक्त महागठबंधन को जीत के बाद सरकार बनाने के लिए जरूरत पड़े तो बाहर से समर्थन दे दें। बिहार में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेष यादव भी संयुक्त महागठबंधन से कुछ सीटों में तालमेल कर चुनाव लड़ सकते हैं। जबकि बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायाबती न तो नितीष के साथ जाएंगी और न ही चुनाव में संयुक्त महागठबंधन से समझौता करेंगी। वे अपनी पार्टी के प्रत्याषियों को उतारकर अकेले चुनाव लड़ सकती हैं।
संयुक्त महागठबंधन के सामने सबसे बड़ी समस्या एआइएमआइएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन आवैसी हैं जिनकी पार्टी पिछली बार बिहार के 32 स्थानों पर चुनाव लड़ी थी। वे अगर भाजपा के विरोधी हैं तो कांग्रेस के भी विरोधी हैं। संयुक्त महागठबंधन आगामी विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को कैसे जोड़ेगा, यह बड़ी समस्या है। महागठबंधन में सबसे बड़ी समस्या सीटों का बंटवारा होगा। महागठबंधन के नेताओं ने यदि इस समस्या को किसी भी तरह निपटा लिया तो मुख्यमंत्री नितीष कुमार और राजग को बिहार में आसानी से हराया जा सकता है।
बिहार में यादव और मुस्लिम मतदाता भाजपा और राजग को हराने के लिए लगभग कमर कसे हुए हैं। लेकिन जनता में मुख्यमंत्री के रूप में नितीष कुमार आज भी सबसे बेहतर छवि बाले नेता हैं। लेकिन पिछले दिनों राज्य के अस्पतालों में आक्सीजन की कमी से सैकड़ों बच्चों की हुई मौतें, कोरोना महामारी में बिहार के अस्पतालों की बदइंतजामी का आलम, इसके कारण हुई तमाम मौतें, अस्पतालों की बदइंतजामी से आक्रोषित लोग और भीषण बाढ़ के कारण हजारों लोग जो बेघर होगए। सैकड़ों लोग मर गए। हजारों किसानों की फसलें डूब गईं और लाखों लोगों की बाढ़ ने गृहस्थी चैपट कर दी। आगामी चुनाव मंे इन पीड़ितों का गुस्सा भी वर्तमान सरकार को झेलना पड़ सकता है।

संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.

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