बुंदेली परंपराओं को बरकरार रखे है दिवारी नृत्य के पोषक

बांदा, महोबा और महुरानीपुर के कलाकार कर रहे कला संरक्षण
हर वर्ष दिवाली के मौके पर जगह जगह करतें आयोजन
उरई(जालौन)। बुंदेली परंपराओं की बात ही अनौखी है यहां पुरातन ऐसी कई पंरपराये है जो यहां की संस्कृति और गौरवशाली इतिहास की गवाह बनी हुयी है। इनमें से एक है दिवारी नृत्य जो हर साल दिवाली के मौके पर कला प्रेमियों को न सिर्फ बुन्देली विरासत के दर्शन कराती है वल्कि इसके संरक्षण में जुटे कलाकारों की बेजोड़ अदभुत क्षमता का अहसास कराती है। बांदा महोबा और महुरानीपुर के कई कलाकार गैर जनपदों में पहुंचकर अपनी विरासतन कला को संरक्षित करने में जुटे हुये है।
पंरपराओं के परिवेश में पूरे बुदेलखंड में दीवाली के मौके पर दीवारी गायन नत्य और मौन चराने की अनूठी ही पंरपरा देखते ही बनती है यहा दीवाली के मौके पर मौन चराने वाले मौनिया ही सर्वाधिक आर्कषण का केन्द्र होते है मौनियों के अनुसार दापरयुग से प्रचलित इस परंपरा के मुताबिक विपत्तियों को दूर करने के लिये ग्वाले मौन चराने का कठिन व्रत रखते है यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पडता है तेरहवें वर्ष में मथुरा या व्रन्दावन जाकर मौन चराना पडता है वहां यमुना नदी के तट पर बसे विश्राम घाट में पूजन का व्रत तोडना पडता है। इसी के साथ दीवारी गायन और नत्य की परंपरा का निर्वाह किया जाता है। आज गोबरधन की पूजा के दिन दिवारी नत्य के कलाकार माौनियाओ ने दिन भर जगह जगह नत्य कर लोगो को अपनी और आर्कषित किया।
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