रोज कुआं खोदते हैं फिर भी प्यासे रह जाते हैं- अधिवक्ता

72 दिनों के लॉक डाउन में तमाम अधिवक्ताओं ने इज्जत बचाकर लेली सरकारी खाद्यान किट
देशभर मे है 20,00,853 अधिवक्ता
उत्तरप्रदेश में है कुल 2,88,297 अधिवक्ता
60,000 हैं अधिवक्ताओं के मुंशी
15,00 स्टाम्प वेंडर, 5,000 हैं टाइपिस्ट
अनिल शर्मा+संजय श्रीवास्तव+अशोक त्रिपाठी जीतू
उरई: वैश्विक वायरस कोरोना महामारी के 69 दिनों के लॉक डाउन और अब अनलॉक 1 के चलते अधिवक्ता, उनके परिवार, मुंशी, स्टाम्प वेंडर, टाइपिस्ट जो रोज कुआं खोदने वाली बिरादरी मानी जाती है। इस बिरादरी और उनके परिजनों का पेट तभी भरता है जब अधिवक्ता रोज कमा कर लाता है। लॉक डाउन और अनलॉक 1 के चलते देश की सभी अदालतों में काम काज लगभग ठप्प रहा। अधिवक्ता और उनसे जुड़े सभी लोगों की आर्थिक हालत बहुत ही पतली हो गयी। न केंद्र सरकार ने, न राज्य सरकार ने, न ही बार कॉउन्सिल ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे इनकी ग्रहस्ती की गाड़ी थोड़ी आसानी से चल जाती। हालत ये रही कि अधिवक्ता रोज कुआं तो खोदता रहा लेकिन वो तथा उससे जुड़े सभी लोग और सभी के परिवार प्यासे ही रहे(तमाम अधिवक्ताओं और उनसे जुड़े लोगों को कई कई दीनों तक फांके भी करने पड़े)।
मालूम हो कि पूरे देश में 20,00,853 अधिवक्ता पंजीकृत हैं। जबकि उत्तरप्रदेश में कुल पंजीकृत अधिवक्ताओं की संख्या 2,88,297 है। अगर केवल अधिवक्ताओं के परिवार की ही संख्या को जोड़ लिया जाए तो पूरे उत्तरप्रदेश में वो लगभग 15,00,000 के आसपास हो जाती है। इसमे अधिवक्ता का परिवार, उसके माता पिता, छोटे भाई आदि भी हैं। इसी तरह प्रदेश में अधिवक्ताओं के मुंशियो की संख्या लगभग 60,000 है। उनके परिवारों की संख्या को जोड़ा जाए तो वो लगभग 2,50,000 हो जाती है। इसी तरह प्रदेश में स्टाम्प वेंडरों की संख्या लगभग 15,000 है। उनके परिवारों को मिलाकर जोड़ा जाए तो यह संख्या 75,000 हो जाती है। इसी तरह टाइपिस्टों की संख्या पूरे प्रदेश में 5,000 है। उनके परिवार को भी जोड़ लिया जाए तो यह संख्या 25,000 हो जाती है। यानी अकेले उत्तरप्रदेश में वकालत से जुड़े अधिवक्ता, मुंशी, स्टाम्प वेंडर, टाइपिस्ट के परिवारों को जोड़ा जाए तो यह संख्या लगभग 50,00,000 के आसपास पहुंच जाती है। यदि देश के स्तर पर सोचें तो यह संख्या दो से ढाई करोड़ के आसपास पहुंच जाएगी।
लखनऊ हाई कोर्ट के अधिवक्ता शोभित कांत कहते हैं कि हाई कोर्ट और जिला अदालतों को मिला दें तो यह संख्या लगभग 12,000 हो जाएगी। लॉक डाउन के दौरान अदालतें बन्द रहीं। तो अधिवक्ता, मुंशी और उनसे जुड़े लोगों को तो कुछ मिलना ही नहीं था। अब 5.0 में लॉक डाउन है या थोड़ी छूट मिली है। तो अदालतें भी खुली मगर उनमे डिजिटल तरीके से सुनवाई हो रही है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से केवल इम्पोर्टेन्ट मुकदमों को ही जज सुन रहे हैं। उसमें भी समस्या ये है ई-फाइलिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जो काम किया जा रहा है। कई बार सिग्नल न आने से नेट नहीं चलता है और काम प्रभावित होता है। सबसे बड़ी बात ये है कि ई-फाइलिंग का काम अभी तमाम अधिवक्ता, उनका स्टाफ ठीक तरह से नहीं जानते हैं। उन्होंने कहा लॉक डाउन के दिन अधिवक्ता और उनसे जुड़े हुए लोगों को बहुत तकलीफ भरे दिन से गुजरना पड़ा है। उनकी सहायता न सरकार ने की न बार कॉउन्सिल की। बाँदा जिला बार के पूर्व अध्यक्ष आनंद सिन्हा कहते हैं कि बांदा जिले में कुल मिलाकर 1800 अधिवक्ता पंजीकृत हैं। जबकि जिला बार संघ मे लगभग 1400 अधिवक्ता पंजीकृत हैं। उन्होंने कहा कि लॉक डाउन के दौरान प्रदेश के कानून मंत्री बृजेश पाठक ने घोषणा की थी कि 3 साल तक कि प्रैक्टिस करने वालो को 5,000 रुपए देंगे। लेकिन वो आजतक किसी को नहीं मिला। बार कॉउन्सिल के पास भी काफी रुपया एकाउंट में है। लेकिन उसने भी आर्थिक रूप से कमजोर अधिवक्ताओं के लिए कुछ नहीं किया। श्री सिन्हा ने बताया कि वर्तमान बार अध्यक्ष अवधेश खादीवाला के माध्यम से डीएम से कहकर गरीबों और मजदूरों को दी जाने वाली 300 खाद्यान किटें मंगवाई थीं। जिन्हें उन अधिवक्ताओं में बांटा गया जिनके परिवार में चूल्हा जलने की समस्या थी। श्री सिन्हा ने कहा कि अधिवक्ता को तो वकील साहब कहा जाता है। लेकिन लॉक डाउन ने अधिकांश वकीलों की आमदनी मनरेगा मजदूरों के बराबर भी नहीं रही। सरकार को तो छोड़िए विपक्षी दलों ने और समाज सेवी संगठनों ने भी उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उरई के वरिष्ठ अधिवक्ता रतन दीप तिवारी, राजेश चतुर्वेदी, प्रमोद वर्मा, अवधेश चौहान, हेमंत दुबे ने बताया कि लॉक डाउन के दौरान जो अधिवक्ता, मुंशी, स्टाम्प वेंडर, टाइपिस्ट गांव से जुड़े हैं उनके खाने को खाद्यान गांव से आ गया और जो सिर्फ वकालत पर ही निर्भर हैं उन्हें और उनके परिवार को बहुत तकलीफ उठानी पड़ी। लेकिन न तो सरकार से और न ही बार कॉउन्सिल से इन्हें कोई सहायता नहीं मिली। इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषिकेश त्रिपाठी, जितेंद्र मिश्रा ने बताया कि लॉक डाउन के दौरान कोई कार्य हाई कोर्ट और जिला अदालतों में नही होता रहा है। अनलॉक 1 के बाद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जजों ने इम्पोर्टेन्ट मुकदमे ही सुने, सामान्य काम काज ठप्प रहा। कोरोना के डर से न मुवक्किल पहले आया न अब आ रहा है। तो फिर पैसा कहाँ से मिलेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट और जिला अदालत को मिलाकर कुल पंजीकृत अधिवक्ताओं की संख्या 12,000 है। केंद्र और राज्य सरकार ने इस तकलीफ के समय मे अधिवक्ताओं को कुछ नहीं दिया। बार कॉउन्सिल इलाहाबाद में सिर्फ एक बार 50 से 60 अधिवक्ताओं को मात्र 2-2 हज़ार रुपए दिये हैं। अब आप ही बताइए कि किसी अधिवक्ता का पारिवारिक खर्च 2,000 रुपए में 72 दिनों तक चल जाएगा? सच कहा जाए तो लॉक डाउन का यह समय अधिवक्ताओं, मुंशी, स्टाम्प वेंडरो, टाइपिस्टों और उनके परिवार के लिए बहुत ही कठिन समय रहा है। झाँसी जिला बार संघ के पूर्व अध्यक्ष नरोत्तम स्वामी कहते हैं कि अधिवक्ता ऐसा पद है कि वह न मजदूरी कर सकता है और न ही अपनी आर्थिक स्थिति किसी से बता सकता है। वह सिर्फ भीतर ही भीतर घुलता ही रह जाता है। उन्होंने बताया कि झाँसी जिले ने करीब 2,300 अधिवक्ता पंजीकृत हैं। लेकिन जिला बार झाँसी में लगभग 1500 अधिवक्ता पंजीकृत हैं। उन्होंने बताया कि लॉक डाउन के कारण अदालतें बन्द रहीं। बीच बीच मे खुली तो कोई काम नहीं हुआ। वकीलों का अन्नदाता मुवक्किल कोरोना के भय से आया ही नहीं। जिसके कारण पैसा भी नहीं आया। तमाम अधिवक्ताओं, मुंशी, स्टाम्प वेंडर, टाइपिस्ट और उनके परिवारी जानो को कई बार फांके करने पड़े। हमीरपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेन्द्र सक्सेना और जितेंद्र पांडे ने बताया कि जिले में अधिवक्ताओं की संख्या 1200 है। उन्होंने कहा कि लॉक डाउन में जो तकलीफ अधिवक्ताओं और उनके सहयोगियों ने उठायी वो तो अलग है। लेकिन सबसे तकलीफ देह बात यह है कि आजतक किसी भी सरकार ने वकीलों को लाभान्वित करने की कोई योजना बनाई ही नहीं। उसे न तो सस्ता राशन मिलता है न ही कोई सरकार से कोई ऋण मिलता है। 75 प्रतिशत वकीलों की हालत आमदनी के हिसाब से मनरेगा मजदूरों से भी गयी बीती है। ललितपुर के अधिवक्ता मनोज कुशवाहा ने बताया कि यहां जिले में पंजीकृत अधिवक्ताओं की संख्या 1300 है। वे कहते हैं कि अधिवक्ताओं को दर्द को न सरकार ने जाना न समाज ने। लॉक डाउन ने बड़ी कुगत भई। महोबा के अधिवक्ता रामावतार सिंह का कहना है कि जिले में अधिवक्ताओं की संख्या लगभग 1100 है। लॉक डाउन ने अधिवक्ता, मुंशी, स्टाम्प वेंडर, टाइपिस्ट और उनके परिजनों को बुरी तरह तोड़ दिया है। चित्रकूट के अधिवक्ता धर्मपाल ने कहा कि यहां जिले में 1200 अधिवक्ता पंजीकृत हैं। जिनमे 300 से 400 अधिवक्ता ऐसे हैं जिनके घरो में लॉक डाउन के दौरान कई दिनों तक चुल्हा नहीं जला। पूर्व जिला जज शक्तिकांत और पूर्व सीबीआई जज अवधेश नारायण द्विवेदी तथा प्रदेश के सभी अधिवक्ताओं का यह मत है कि केन्द्र और राज्य सरकार इस तकलीफ देह स्थिति के बाद अधिवक्ताओं, मुंशी, स्टाम्प वेंडर, टाइपिस्ट के लिए कोई ऐसी राहत भरी योजना लाए जिससे अधिवक्ताओं और उनसे जुड़े काम करने वाले लोगों का आर्थिक स्तर बेहतर बन जाए।
संजय श्रीवास्तव-प्रधानसम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, डॉ. राकेश द्विवेदी- सम्पादक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.
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