सत्ता से लाभांन्वित होकर अरबपति बनने से दलितों का भला नहीं होगा- बाबू रामाधीन

डा0 अंबेडकर ने कहा कि यदि आरक्षण आगे चला तो इससे दलितों का बड़ा अहित होगा
मा0 कांषीराम ने जाति व्यवस्था के विरोध में नौकरी छोड़ी और फिर मिषन के लिए शादी नहीं की
मा0 कांषीराम एक कमरे में रहते थे और मिषन के चन्दे का एक पैसा भी अपने ऊपर खर्च नहीं करते थे
मानवता की बहाली ही वास्तव में अंबेडकरवाद है

अनिल शर्मा+संजय श्रीवास्तव+डॉ. राकेश द्विवेदी

उरई। प्रसिद्ध अंबेडकरवादी चिंतक बाबू रामाधीन ने मान्यवर कांशीराम के साथ जीवन बिताया है। वे कहते हैं कि मान्यवर ने अपना पूरा जीवन मिशन के लिए तथा डाक्टर बाबा साहब के सिद्धान्त मानवता की बहाली के लिए जिया। बाबू रामाधीन कहते हैं कि आप दलित राजनीति के सहारे सत्ता से लाभांन्वित होकर करोड़पति और अरबपति तो बन सकते हो। लेकिन इससे न तो दलितों का उत्थान होगा और न ही मानवता की बहाली होने वाली है। जिसे बाबा साहब भीमराव अंबेडकर चाहते थे।
वे बताते हैं कि कांशीरामजी रक्षा अनुंसंधान में वैज्ञानिक के पद पर काम करते थे। एक दिन जब 14 अप्रैल को और एक बाद तथागत गौतम बुद्ध की जयंती की छुट्टियां डायरेक्टर ने रद्द कर दीं, तो इसका विरोध उसी विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दीना भाना ने किया तो उसे निलंबित कर दिया गया। कांशीराम जी इस बात पर हतप्रभ रह गए कि इन दिनों महापुरुषों ने ऐसा क्या किया कि इनके प्रति समाज में कुछ लोगों में नफरत का भाव है। यह उनके जीवन का पहला टर्निंग प्वांइट था। इसके बाद उन्होंने कर्मचारियों के साथ मिलकर संघर्ष किया तथा डाॅ0 अंबेडकर, तथागत बुद्ध के बारे में गहराई से अध्ययन किया।
उन्होंने दोनों महापुरुषों के जन्मदिन की छुट्टियां बहाल कराईं तथा दीना भाना को निलंबन से बहाल कराया। इसके बाद उन्होंने जाति व्यवस्था के विरोध में दलितों और मानवता की बहाली के लिए नौकरी छोड़ दी और आजीवन शादी न करने का संकल्प लिया। पहले उन्होंने डाक्टर साहब की पार्टी आरपीआइ को खड़ा करने की सोची, लेकिन तब तक उसके 14 टुकड़े हो चुके थे। इसलिए उन्होंने पूरे देश में मानवता की बहाली के लिए नया संगठन बनाने की सोची। सबसे पहले उन्होंने दलित आंदोलन के बारे में बाबा साहब से पे्ररणा लेते हुए 1965 से 1975 तक 100 किमी प्रतिदिन साइकिल चलाकर महाराष्ट्र में बाबा साहब के आन्दोलन को खड़ा किया। 1978 में बामसेफ का गठन किया। इसके बाद 1982 में डीएस फोर (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) का गठन किया। इसके बाद 1983 में डीएस फोर ने हरियाणा में पहला चुनाव लड़ा। 1984 में 14 अप्रैल को बसपा की स्थापना की । इस वर्ष बसपा के बैनर तले देश भर में कई प्रान्तों में प्रत्याषी खड़े किए गए और देष में पहली बार दलित और शोषित समाज में चेतना जगाने के लिए दो पैरों ओैर दो पहियों का आंदोलन पूरे देष में चलाया गया। उन्होंने जम्मू कष्मीर से लेकर दक्षिण प्रान्तों तक करीब दस हजार किमी साइकिल यात्रा की। इस दौरान बैठकें व सभाएं करके समाज को जागरूक किया।
बाबू रामाधीन बताते हैं कि 1978 से ही वे कांशीराम जी और मिशन से जुड़ गए थे। बहन मायाबती कांशीराम जी के आंदोलन से 1980 से जुड़ गईं थी। उसके बाद मायाबती को 1980, 1984 और 1989 में हरियाणा, बिजनौर और हरिद्वार से चुनाव लड़ी तथा बिजनौर से सांसद बनी। 1991 में जब कांशीराम इटावा से चुनाव लड़े तो वे उनके चीफ इलेक्षन एजेण्ट तथा सांसद प्रतिनिधि बने। इसी तरह पंजाब में 1992 में जब मायाबती होशियारपुर से चुनाव लड़ीं तो वे उनके भी चुनाव एजेण्ट बने थे।
अंबेडकरवादी चिंतक बाबू रामाधीन कहते हैं भले ही उप्र में बसपा को चार बार सत्ता मिली हो। भले ही सत्ता से कुछ लोग लाभांन्वित होकर करोड़पति अरबपति बन गए हों लेकिन यह न तो मिशन है और न ही डाक्टर अंबेडकर और मान्यवर काशीराम ने दलितों की बहाली का जो सपना देखा था वह है। बाबा साहब ने अपने अन्तिम समय में यह बात कही थी कि चीटों से गुड़ की रखवाली नहीं कराई जा सकती है। चरित्रहीन और भ्रष्टाचार में लिप्त लोग दलितों को इंसानियत की जिन्दगी नहीं दिला सकते हैं। इसी बजह से 14 अक्टूबर 1956 को यह साफ कहा था कि हमने यह अनुभव से समझ लिया है कि रिजर्वेशन राजनैतिक लोग संविधान में प्रदत्त दलितों की सुविधाओं का स्वयं उपभोग कर रहे हैं और उनके नजदीकी लोग भी यही कर रहे हैं। यदि यह रिजर्वेशन आगे चला तो दलितों का बड़ा अहित होगा इसलिए मैं प्रबल संस्तुति करता हूं कि रिजर्वेशन को समाप्त किया जाए। अंबेडकरवादी चिंतक बाबू रामाधाीन कहते हैं कि ऐसी स्थिति में कोई भी दल हो जिसकी नियत और नीति दलित विरोधी हो तो वो चाहे सवर्ण हो या दलित हो तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए डाक्टर अंबेडकर और मान्यवर और कांशीराम ने एक स्वर में कहा है कि दलितों को इंसानियत की जिन्दगी केवल निष्ठावान, ईमानदार और योग्य लोग ही दिला सकते हैं।

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