स्टेशनरी और पुस्तक विक्रेताओं पर गिरी कोरोना काल की गाज

सन्नाटे मे बैठा पुस्तक विक्रेता

बीस से पच्चीस फीसदी तक ही सिमट कर रह गयी बिक्री

नही चला नये शिक्षण सत्र का अतापता दुकानों पर अब तक सन्नाटा

उरई(जालौन)। कोरोना संकमण के असर से भले ही लोग अपने को महफूज पा रहे हो। पर हकीकत यह है जितना प्रभाव बीमारी के संक्रमण से हुआ है उसके सापेक्ष उसका असर सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाओं पर भी गहरा पडा है। फिर चाहे वह स्टेशनरी और पुस्तक विके्रता ही क्यों न हो कोरोना ने इनके रोजगार को भी गहरा आघात पहुंचाया है। दुकानदारों की माने तो मौजूदा हाल में भी स्टेशनरी और पुस्तको की बिक्री बीस से तीस फीसदी तक ही हो पा रही है।
अमूमन अप्रेल माह में नये शिक्षण सत्र का आगाज हो जाता है स्कूल खुलने के साथ ही स्टेशनरी और पुस्तकों की दुकानों पर छात्र छात्राओं की भीड उमडने लग जाती है जून और जुलाई के माह में दुकानदारों को इतनी फुर्शत तक नही मिल पाती कि वह पल भर को भी सुकून के साथ बैठ सके लेकिन इन दिनों इसके ठीक विपरीत दुकानदार हाथ पर हाथ धरें खाली बैठे है अनलाक के बाद कुछ हद तक स्कूल तो खुल गये पर बच्चें अभी तक पूरी तरह से स्कूल नही पहुच पा रहे है जिससे पढाई व्यवस्था सुचारू रूप से नही चल पा रही है जिसका नतीजा यह रहा कि अब तक बाजार के अधिकांश पुस्तक और स्टेशनरी विके्रताओं की दुकानों पर सन्नाटा पसरा हुआ है दुकानदारों की माने तो हालात यह बन गये है कि वह अपने खर्चे भी बामुश्किल निकाल पा रहे है। कुल मिलाकर आधा शिक्षण सत्र निकल जाने के बाद भी उन्हें अभी स्थितियां सुधरने की कम ही उम्मींद नजर आ रही है।

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